बिहार की सियासत में ‘सम्राट’ युग का उदय: नीतीश के 21 साल के ‘राज’ का अंत और बीजेपी का मास्टरस्ट्रो

बिहार में सत्ता परिवर्तन कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार का परिवर्तन ‘चेहरा’ और ‘चाल’ दोनों बदलने वाला है। नीतीश कुमार के नेपथ्य में जाने और सम्राट चौधरी के उदय ने यह साफ़ कर दिया है कि बीजेपी अब बिहार को अपनी प्रयोगशाला बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

पटना: बिहार की राजनीति, जो अपनी अनिश्चितताओं और चौंकाने वाले मोड़ों के लिए दुनिया भर में मशहूर है, आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव लगती थी। राजभवन के प्रांगण में जब सम्राट चौधरी ने बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक व्यक्ति का शपथ ग्रहण नहीं था, बल्कि बिहार की सत्ता के ‘नॉटिकल माइल्स’ में आए एक बहुत बड़े सुनामी का संकेत था।

भारतीय जनता पार्टी ने वह कर दिखाया जो पिछले तीन दशकों में वह कभी नहीं कर पाई—बिहार की कुर्सी पर अपना ‘शुद्ध’ मुख्यमंत्री बिठाना। सम्राट चौधरी बिहार में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बनकर इतिहास की किताबों में दर्ज हो गए हैं। लेकिन इस ताजपोशी के पीछे जो ‘मिर्च-मसाला’, जातीय गणित और सियासी बिसात बिछी है, वह किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है।

1. नीतीश युग का अवसान: चाणक्य की विदाई या विश्राम?

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File Photo Nitish Kumar

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक और चौंकाने वाला पहलू रहा नीतीश कुमार का इस्तीफा और उनकी नई भूमिका। करीब 21 साल तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहने वाले नीतीश कुमार ने हाल ही में राज्यसभा की सदस्यता की शपथ ली। इसके साथ ही बिहार की राजनीति का वह ‘नीतीश काल’ समाप्त हो गया, जिसने बिहार को ‘जंगलराज’ से बाहर निकाला और ‘सुशासन’ की नई परिभाषा गढ़ी।

 

  • सात दिन से 21 साल तक का सफर: साल 2000 में जब नीतीश पहली बार केवल सात दिनों के लिए सीएम बने थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह शख्स नवंबर 2005 से शुरू होने वाली अपनी पारी से बिहार की नियति बदल देगा।

  • क्यों हटे नीतीश?: राजनीतिक गलियारों में चर्चा गरम है कि क्या नीतीश ने स्वेच्छा से राज्यसभा का रुख किया या यह बीजेपी के उस ‘ऑपरेशन क्लीन’ का हिस्सा था, जिसके तहत भगवा दल अब जूनियर पार्टनर बनकर नहीं रहना चाहता था।

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2. सम्राट चौधरी: बीजेपी का ‘ब्रह्मास्त्र’ और नया चेहरा

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार में एक बहुत बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है। सम्राट, जो कभी लालू प्रसाद यादव की सरकार का हिस्सा हुआ करते थे, आज उसी विचारधारा के सबसे बड़े विरोधी बनकर उभरे हैं।

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जातीय बिसात का ‘बादशाह’: बिहार में जाति कभी राजनीति से अलग नहीं रही। सम्राट चौधरी ‘कुशवाहा’ समाज से आते हैं, जिसकी आबादी बिहार में यादवों के बाद पिछड़ों में सबसे अधिक (लगभग 4.2%) है।

  • बीजेपी की मजबूरी और जरूरत: वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा के अनुसार, बीजेपी के पास सम्राट के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। पार्टी ने वर्षों तक यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की, लेकिन ‘नित्यानंद राय’ और ‘भूपेंद्र यादव’ जैसे चेहरों के बावजूद यादव वोट आरजेडी के पास ही रहा।

  • लव-कुश समीकरण पर कब्जा: नीतीश कुमार का सबसे बड़ा आधार ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) वोट बैंक रहा है। नीतीश के जाने के बाद बीजेपी ने सम्राट को आगे कर इस पूरे वोट बैंक को अपनी झोली में करने का दांव खेला है।

3.  डिप्टी सीएम और कैबिनेट का तड़का

शपथ ग्रहण समारोह में केवल सम्राट ही आकर्षण का केंद्र नहीं थे। उनके साथ दो ‘चाणक्य’ और शपथ ले रहे थे—विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव।

  • विजय कुमार चौधरी: नीतीश कुमार के ‘हनुमान’ कहे जाने वाले विजय चौधरी का नई सरकार में शामिल होना यह बताता है कि सरकार भले ही बीजेपी की हो, लेकिन अनुभव और प्रशासनिक पकड़ अभी भी नीतीश के पुराने वफादारों की ही चलेगी।

  • बिजेंद्र प्रसाद यादव: सुपौल के इस कद्दावर नेता को ‘बिहार का बिजली पुरुष’ कहा जाता है। सबसे उम्रदराज मंत्री होने के नाते, वे इस नई सरकार के लिए ‘इंजन के ऑयल’ की तरह काम करेंगे जो अनुभव और जोश के बीच तालमेल बिठाएंगे।

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चर्चा है कि ये दोनों नेता उपमुख्यमंत्री के रूप में काम करेंगे, जिससे सरकार में जेडीयू और बीजेपी के बीच एक ‘बैलेंस ऑफ पावर’ बना रहे।

4. जीतनराम मांझी का इमोशनल कार्ड

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File Photo Jitan Ram Manjhi

समारोह में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने। जब वे मीडिया के सामने आए, तो उनकी आंखों में चमक और आवाज में भारीपन था। उन्होंने साफ़ कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूं, नीतीश जी की वजह से हूं।” मांझी का यह बयान उस ‘महादलित’ राजनीति की याद दिलाता है जिसे नीतीश कुमार ने जन्म दिया था। अब सवाल यह है कि क्या सम्राट चौधरी इन महादलितों को भी अपने साथ जोड़ पाएंगे?

5. आरजेडी का ‘एमवाई’ बनाम बीजेपी का ‘नई केमिस्ट्री’

बिहार की राजनीति अब दो ध्रुवों में बंट गई है। एक तरफ लालू यादव का ‘एमवाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण है, जो 14% यादवों और 17% मुस्लिमों के भरोसे है। दूसरी तरफ सम्राट चौधरी की अगुवाई में बीजेपी की ‘नई केमिस्ट्री’ है, जिसमें सवर्ण, अति पिछड़ा (EBC), और कुशवाहा समाज शामिल है।

विश्लेषकों का मानना है कि:

  1. बीजेपी अब ‘छोटे भाई’ की भूमिका से पूरी तरह बाहर आ चुकी है।

  2. सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना सीधे तौर पर तेजस्वी यादव को चुनौती देना है।

  3. 1990 से 2005 के उस दौर को बार-बार याद दिलाना, जिसमें यादवों का वर्चस्व था, बीजेपी का प्रमुख चुनावी हथियार होगा ताकि गैर-यादव पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया जा सके।

6. सम्राट की राजनीतिक विरासत और चुनौतियां

सम्राट चौधरी के लिए यह सफर आसान नहीं रहा है। उन्होंने 1982 में अपने पिता शकुनी चौधरी की मृत्यु के बाद राजनीति में कदम रखा था। कांग्रेस के टिकट से सफर शुरू करने वाले सम्राट ने आरजेडी, जेडीयू और फिर बीजेपी तक का सफर तय किया है।

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उनके सामने सबसे बड़ी चुनौतियां:

  • नौकरशाही पर नियंत्रण: 21 साल तक नीतीश कुमार ने नौकरशाही को अपने हिसाब से चलाया है। सम्राट के लिए इस स्थापित सिस्टम में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होगा।

  • सहयोगियों के साथ तालमेल: जेडीयू के दिग्गज मंत्रियों के साथ काम करना, जो कल तक सम्राट के कड़े आलोचक थे, एक बड़ी परीक्षा होगी।

  • बिहार का विकास: ‘सुशासन’ के टैग को बरकरार रखते हुए बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर काम करना, जिस पर सम्राट पहले विपक्ष में रहते हुए अपनी ही सरकार को घेरते थे।

 बिहार के लिए ‘सब चंगा’ या एक नया संघर्ष?

बिहार में सत्ता परिवर्तन कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार का परिवर्तन ‘चेहरा’ और ‘चाल’ दोनों बदलने वाला है। नीतीश कुमार के नेपथ्य में जाने और सम्राट चौधरी के उदय ने यह साफ़ कर दिया है कि बीजेपी अब बिहार को अपनी प्रयोगशाला बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

क्या सम्राट चौधरी बिहार के लिए वही कर पाएंगे जो योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के लिए किया? या फिर बिहार की जटिल जातिगत राजनीति उन्हें भी उलझा देगी?

यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में बिहार की कैबिनेट में किसे जगह मिलती है और ‘मिर्च-मसाले’ से भरी यह नई सियासी खिचड़ी जनता को कितनी स्वादिष्ट लगती है।

 न्यूज़ डेस्क, The Newsic

Ayush Mishra

journalist

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