वॉशिंगटन/नई दिल्ली,
अमेरिका ने भारत सहित 54 देशों से आने वाले कुछ आयातित उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन देशों ने कथित रूप से उन वस्तुओं के आयात पर प्रभावी रोक लगाने और नियमों को सख्ती से लागू करने में पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं, जिनका उत्पादन जबरन श्रम (Forced Labour) के माध्यम से किया जाता है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निर्यात उद्योगों और द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने इस वर्ष मार्च में अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301 के तहत एक जांच शुरू की थी। इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि अमेरिका के व्यापारिक साझेदार देश जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं के आयात को रोकने और नियंत्रित करने के लिए कितने प्रभावी कदम उठा रहे हैं। कई महीनों तक चली इस प्रक्रिया के बाद जारी रिपोर्ट में भारत सहित 54 देशों को जांच के दायरे में रखा गया।
रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में लागू नीतियों और व्यवस्थाओं को अमेरिका ने पर्याप्त नहीं माना है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि यदि किसी देश में जबरन श्रम से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रभावी प्रतिबंध नहीं लगाए जाते, तो इससे निष्पक्ष व्यापार व्यवस्था प्रभावित होती है और अमेरिकी उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
भारत की प्रतिक्रिया
इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद भारत सरकार ने कहा है कि वह इस विषय पर अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और इस मुद्दे पर सभी आवश्यक पहलुओं पर चर्चा की जा रही है। साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत इस मामले में अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने के लिए सभी उपलब्ध कूटनीतिक और आर्थिक विकल्पों पर विचार कर रहा है। अधिकारियों का मानना है कि संवाद और सहयोग के माध्यम से समाधान निकालना दोनों देशों के हित में होगा।
जांच प्रक्रिया अभी पूरी नहीं
हालांकि अमेरिका ने शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन यह अभी अंतिम निर्णय नहीं है। प्रभावित देशों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया है। इच्छुक देश 22 जून तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा 6 जुलाई तक लिखित टिप्पणियां जमा की जा सकती हैं, जबकि 7 जुलाई को सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी। इन प्रक्रियाओं के बाद अमेरिकी प्रशासन अंतिम निर्णय लेगा।
व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इस चरण में संबंधित देशों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले तर्क और दस्तावेज अंतिम फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए आने वाले सप्ताह इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
न्यायालय के फैसले के बाद बदला अमेरिकी रुख
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला भी है। इसी वर्ष फरवरी में अदालत ने पूर्व में लागू कुछ पारस्परिक (Reciprocal) शुल्कों को निरस्त कर दिया था। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने व्यापारिक नीतियों के नए विकल्पों पर विचार शुरू किया। विशेषज्ञों का मानना है कि धारा 301 के तहत की गई जांच और प्रस्तावित नए शुल्क उसी रणनीति का हिस्सा हैं।
फरवरी में अमेरिका ने सभी आयातों पर अस्थायी रूप से 10 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय भी लिया था। यह व्यवस्था 24 जुलाई तक प्रभावी रहने वाली है। ऐसे में नया प्रस्ताव अमेरिकी व्यापार नीति में एक और महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
भारत को किन देशों के साथ रखा गया?
प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था में भारत को उन देशों की श्रेणी में रखा गया है जिनमें बांग्लादेश, चीन, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रमुख एशियाई निर्यातक देश भी शामिल हैं। ये सभी देश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अमेरिकी बाजार में बड़ी मात्रा में उत्पाद भेजते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रस्तावित शुल्क लागू हो जाता है, तो इन देशों से अमेरिका को निर्यात होने वाली कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव वस्त्र, परिधान, विनिर्माण और अन्य श्रम-आधारित उद्योगों पर विशेष रूप से देखने को मिल सकता है।
वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र के लिए अलग व्यवस्था
अमेरिकी प्रस्ताव में वस्त्र और परिधान उद्योग के लिए एक विशेष प्रावधान भी शामिल किया गया है। इसके तहत कुछ चयनित देशों से सीमित मात्रा में आयात को अपेक्षाकृत कम शुल्क दरों पर अनुमति दी जा सकती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों की आवश्यकताओं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के बीच संतुलन बनाए रखना बताया जा रहा है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि किन देशों और किन उत्पादों को इस विशेष व्यवस्था का लाभ मिलेगा। इस संबंध में अंतिम दिशा-निर्देश बाद में जारी किए जा सकते हैं।
व्यापार जगत की चिंता
व्यापार और उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित शुल्क से वैश्विक व्यापारिक वातावरण में अनिश्चितता बढ़ सकती है। कई निर्यातक कंपनियां पहले से ही बढ़ती लागत, आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों और वैश्विक आर्थिक दबावों का सामना कर रही हैं। ऐसे में अतिरिक्त शुल्क उनके लिए नई चुनौती बन सकता है।
भारतीय निर्यातकों का कहना है कि अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। यदि शुल्क लागू होता है, तो कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि कई विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारत और अमेरिका के मजबूत आर्थिक संबंधों को देखते हुए बातचीत के माध्यम से समाधान निकलने की संभावना बनी हुई है।
आगे क्या?
अब सभी की नजर जुलाई में होने वाली सार्वजनिक सुनवाई और उसके बाद आने वाले अमेरिकी फैसले पर है। भारत समेत प्रभावित देश अपने पक्ष को मजबूती से रखने की तैयारी कर रहे हैं। यदि अंतिम निर्णय में शुल्क लागू किए जाते हैं, तो इसका असर केवल संबंधित देशों पर ही नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।
फिलहाल यह मामला चर्चा और समीक्षा के चरण में है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अमेरिका की यह पहल आने वाले महीनों में वैश्विक व्यापार नीति की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक साबित हो सकती है।
Reference The Hindu