न्यूज़ डेस्क पटना : कोलकाता की एक अदालत ने बलात्कार और धोखाधड़ी के मामले में आरोपी व्यक्ति को बरी कर दिया है। यह मामला नवंबर 2020 में दर्ज हुआ था और करीब चार साल तक चला। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 376 यानी बलात्कार और धारा 417 यानी धोखाधड़ी के आरोप साबित करने में असफल रहा। ऐसे में आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया और उसे बरी कर दिया गया।
यह केस 24 नवंबर 2020 को दर्ज किया गया था। महिला की शिकायत पर पुलिस ने अगले ही दिन आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था। आरोपी को 51 दिनों तक जेल में रहना पड़ा और बाद में 14 जनवरी 2021 को उसे जमानत दी गई थी।
शिकायत में महिला ने कहा था कि वर्ष 2017 से उसका आरोपी के साथ संबंध था। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इसके लिए वह साल्ट लेक स्थित एक होटल में रुके, जहां उन्होंने रात बिताई। महिला का आरोप था कि अगली सुबह आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और वहां से चला गया।
हालांकि सुनवाई के दौरान महिला ने अदालत में जो बयान दिया, उसमें उसने अपने ही पहले आरोपों से अलग बातें कहीं। उसने कहा कि शिकायत असल में उसके दोस्त ने लिखी थी और उसने बिना पढ़े उस पर हस्ताक्षर कर दिए थे। महिला ने यह भी कहा कि अब उसे उस घटना की पूरी जानकारी भी याद नहीं है।
अदालत में महिला की मां, दादी और पड़ोसी को भी गवाह के रूप में बुलाया गया। लेकिन इनमें से किसी ने भी महिला के आरोपों की पुष्टि नहीं की। इसके बाद अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष अपने आरोप साबित करने में नाकाम रहा है।
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिंद्य बनर्जी ने अपने फैसले में कहा कि महिला के बयान से साफ होता है कि दोनों वयस्कों के बीच सहमति से संबंध बने थे। महिला ने खुद ही आरोपी के खिलाफ कोई ठोस आरोप नहीं लगाया। ऐसे में आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता और वह संदेह का लाभ पाने का हकदार है।
इस मामले का फैसला आने के बाद सोशल मीडिया पर भी चर्चा शुरू हो गई। कुछ लोग कह रहे हैं कि जब कोई आरोप सबूतों के बिना दर्ज होता है तो आरोपी की पूरी जिंदगी प्रभावित हो जाती है और उसे समाज में बेवजह शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह के मामले असली पीड़िताओं के लिए न्याय पाना और कठिन बना देते हैं, क्योंकि जब अदालतें बार बार झूठे आरोपों को खारिज करती हैं तो वास्तविक पीड़िताओं की बातों पर भी शक किया जाने लगता है।
यह फैसला इस बात की भी याद दिलाता है कि अदालत में सिर्फ आरोप लगना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे सबूतों और गवाहियों के आधार पर साबित करना जरूरी होता है। अदालत ने साफ कहा कि जब तक ठोस सबूत मौजूद न हों, तब तक किसी को दोषी करार नहीं दिया जा सकता।

















