युवाओं पर बढ़ता मानसिक दबाव: बुज़ुर्गों से ज़्यादा परेशान नई पीढ़ी, रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े

नई दिल्ली: बदलती जीवनशैली, तकनीक पर बढ़ती निर्भरता और सामाजिक रिश्तों में आ रही दूरी का असर अब युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है। हाल ही में जारी एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने संकेत दिया है कि भारत में युवा पीढ़ी मानसिक रूप से बुज़ुर्गों की तुलना में कहीं अधिक तनाव झेल रही है।

वॉशिंगटन स्थित संस्था सैपियन लैब्स की “ग्लोबल माइंड हेल्थ 2025” रिपोर्ट के मुताबिक देश-दुनिया के 85 देशों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में भारत को मानसिक स्वास्थ्य सूचकांक के आधार पर लगभग 60वें स्थान पर रखा गया है। अध्ययन में 47 अलग-अलग मानकों पर लोगों की मानसिक स्थिति को परखा गया।

 

युवाओं की हालत ज्यादा चिंताजनक

रिपोर्ट के अनुसार भारत में 18 से 34 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं का औसत मानसिक स्वास्थ्य स्कोर केवल 33 दर्ज किया गया, जिसे विशेषज्ञ चुनौतीपूर्ण स्थिति मानते हैं। इसके विपरीत 55 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का स्कोर करीब 96 पाया गया, यानी वरिष्ठ नागरिक मानसिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक संतुलित हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार मोबाइल इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताना और वास्तविक सामाजिक मेल-जोल कम होना युवाओं में चिंता, अकेलापन और असंतोष बढ़ा रहा है। पढ़ाई-करियर का दबाव भी मानसिक थकान को तेज कर रहा है।

 

दुनिया से तुलना में भारत

वैश्विक स्तर पर भी दिलचस्प अंतर देखने को मिला।

डोमिनिकन गणराज्य के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य सबसे बेहतर पाया गया (लगभग 91 स्कोर)।

तंजानिया भी बेहतर स्थिति में रहा (करीब 88)।

वहीं ब्रिटेन में युवाओं का स्कोर नकारात्मक श्रेणी में दर्ज हुआ।

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अमेरिका में यह 20 से 30 के बीच रहा।

इसके मुकाबले भारत का 33 स्कोर यह बताता है कि स्थिति न तो सबसे खराब है, लेकिन चिंता से मुक्त भी नहीं है।

 

तकनीक और जंक फूड भी वजह

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत, नींद की कमी, फास्ट फूड का बढ़ता सेवन और परिवार के साथ समय कम बिताना युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। डिजिटल दुनिया में सक्रियता जितनी बढ़ रही है, वास्तविक जीवन के रिश्ते उतने कमजोर हो रहे हैं।

 

विशेषज्ञों की सलाह

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि समस्या गंभीर जरूर है, लेकिन सुधारी जा सकती है।

रोजाना शारीरिक गतिविधि या खेल

परिवार व दोस्तों से नियमित बातचीत

स्क्रीन टाइम सीमित करना

पर्याप्त नींद लेना

और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लेना

ये कदम युवाओं को मानसिक रूप से मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।

 

मानवीय पहलू

आज का युवा अवसरों से भरी दुनिया में जी रहा है, लेकिन उसी अनुपात में अपेक्षाओं का बोझ भी उठाता है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली “परफेक्ट लाइफ” की तुलना उसे अंदर से कमजोर बना देती है। विशेषज्ञ कहते हैं — युवाओं को सलाह नहीं, समझ और साथ की जरूरत है।

यह रिपोर्ट एक चेतावनी भी है और मौका भी — परिवार, समाज और शिक्षा संस्थानों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां सफलता के साथ-साथ मानसिक संतुलन को भी बराबर महत्व मिले।

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