मोबाइल और सोशल मीडिया पर पहरा? भारत में बन सकते हैं नए नियम

नई दिल्ली 

दुनिया भर में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर फ्रांस के राष्ट्रपति ने भारत सहित कई देशों से आग्रह किया कि वे कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग पर कड़े नियम बनाने पर विचार करें। उनका कहना था कि तेज़ी से फैलती आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक और इंटरनेट के बढ़ते दायरे के बीच बच्चों को ऑनलाइन शोषण, मानसिक दबाव और अनुचित सामग्री से बचाना अब सरकारों की प्राथमिक ज़िम्मेदारी बन गई है।

 

क्यों उठी यह मांग?

विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बच्चों की मानसिक सेहत प्रभावित हो सकती है। लगातार स्क्रीन पर रहने की आदत, तुलना की भावना, साइबर बुलिंग और गलत सूचनाएँ बच्चों के व्यवहार और आत्मविश्वास दोनों पर असर डालती हैं। इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए कई देश पहले से ही न्यूनतम आयु तय करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

फ्रांस ने संकेत दिया है कि वह 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर रोक लगाने की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। यूरोप के अन्य देश भी इसी तरह के नियम बनाने पर विचार कर रहे हैं। उनका तर्क है कि जिस तरह शराब, ड्राइविंग या कुछ फिल्मों के लिए आयु-सीमा होती है, उसी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए भी नियम होने चाहिए।

 

भारत में क्या स्थिति है?

भारत ने अभी तक सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा नहीं की है, लेकिन चर्चा शुरू हो चुकी है। कुछ राज्यों में इस दिशा में गंभीर विचार-विमर्श चल रहा है। प्रस्ताव यह है कि 18 वर्ष से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए अभिभावकों की अनुमति अनिवार्य की जा सकती है।

See also  UGC Caste Discrimination Rules 2026 पर घमासान, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान

भारत के डेटा सुरक्षा ढांचे में भी ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जिनके तहत कंपनियों को नाबालिगों से जुड़ी सेवाएँ देने से पहले माता-पिता की सहमति लेनी होगी। साथ ही बच्चों को लक्षित कर विज्ञापन दिखाने और उनके ऑनलाइन व्यवहार की ट्रैकिंग पर भी रोक लगाने की बात कही गई है।

 

डिजिटल लत और मानसिक स्वास्थ्य

हालिया आर्थिक सर्वेक्षण में भी बच्चों के बीच “डिजिटल एडिक्शन” यानी इंटरनेट की लत को गंभीर समस्या बताया गया है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि छोटे बच्चों को स्मार्टफोन देने के बजाय साधारण फोन या केवल पढ़ाई से जुड़े टैबलेट उपयोग में लाए जाएँ। इससे वे पूरी तरह सोशल मीडिया की दुनिया में खोने से बच सकेंगे।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार नोटिफिकेशन, लाइक्स और फॉलोअर्स का दबाव बच्चों के दिमाग पर असर डालता है। कई बच्चे वास्तविक जीवन के बजाय आभासी दुनिया को ज्यादा महत्व देने लगते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई, नींद और सामाजिक व्यवहार प्रभावित होता है।

 

दूसरे देशों के उदाहरण

ऑस्ट्रेलिया पहले ही न्यूनतम आयु लागू करने की दिशा में कड़े कदम उठा चुका है। वहाँ सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना पड़ा कि तय उम्र से कम उपयोगकर्ताओं के अकाउंट हटाए जाएँ। लाखों खातों को बंद किया गया ताकि नियमों का पालन हो सके। इससे यह संकेत मिला कि सरकारें अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी वैसी ही सख्ती चाहती हैं जैसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में होती है।

 

कंपनियों की जिम्मेदारी

सरकारें अब केवल परिवारों पर जिम्मेदारी नहीं छोड़ना चाहतीं। प्रस्तावित नियमों में तकनीकी कंपनियों को भी जवाबदेह बनाने की बात है। प्लेटफॉर्म को ऐसे फिल्टर लगाने होंगे जिससे बच्चों तक हिंसक या अश्लील सामग्री न पहुँचे। साथ ही उन्हें यह भी देखना होगा कि एल्गोरिद्म बच्चों को नुकसान पहुँचाने वाली सामग्री को बढ़ावा न दें।

See also  राष्ट्रपति की मौजूदगी में सजा बस्तर महोत्सव, लोकनृत्यों ने जीता दिल

 

आगे क्या हो सकता है?

भारत में फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में कुछ न कुछ आयु-आधारित नियम जरूर लागू हो सकते हैं। संभव है कि पूरी तरह प्रतिबंध के बजाय सीमित उपयोग, समय-सीमा या अभिभावकीय नियंत्रण जैसे विकल्प अपनाए जाएँ।

 

डिजिटल दुनिया बच्चों के लिए सीखने और मनोरंजन का बड़ा साधन है, लेकिन बिना नियंत्रण के यह जोखिम भी बन सकती है। अब सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि संतुलन का है — ताकि बच्चे इंटरनेट के फायदे लें, मगर उसकी खामियों से सुरक्षित रहें। आने वाले महीनों में भारत इस मुद्दे पर कौन-सा रास्ता चुनता है, यह देश की डिजिटल नीति की दिशा तय करेगा।

Related Posts

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक अटका: बहुमत के बावजूद नहीं मिल पाया जरूरी समर्थन

नई दिल्ली: संसद के विशेष सत्र में महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से लाया गया महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन प्रस्ताव लोकसभा में अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं…

Read more

लोकसभा परिसीमन पर सियासी हलचल: क्या बदलेगा देश का राजनीतिक नक्शा? दक्षिण भारत की सीटों में बढ़ोतरी के संकेत

नई दिल्ली। देश की राजनीति में इन दिनों एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) को लेकर चर्चा तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah के हालिया बयान ने इस…

Read more

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

बिहार में शुरू हुई स्व-जनगणना, 2 मई से घर-घर जाकर होगी गणना

बिहार में शुरू हुई स्व-जनगणना, 2 मई से घर-घर जाकर होगी गणना

पटना में ई-वाहनों के लिए बड़ी पहल, 58 जगहों पर चार्जिंग स्टेशन की तैयारी

पटना में ई-वाहनों के लिए बड़ी पहल, 58 जगहों पर चार्जिंग स्टेशन की तैयारी

रोमांचक मुकाबले में गुजरात की जीत, गिल बने हीरो

रोमांचक मुकाबले में गुजरात की जीत, गिल बने हीरो

बिहार में बढ़ती इंटरनेट लत: युवाओं के भविष्य पर सवाल

बिहार में बढ़ती इंटरनेट लत: युवाओं के भविष्य पर सवाल

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक अटका: बहुमत के बावजूद नहीं मिल पाया जरूरी समर्थन

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक अटका: बहुमत के बावजूद नहीं मिल पाया जरूरी समर्थन

लोकसभा परिसीमन पर सियासी हलचल: क्या बदलेगा देश का राजनीतिक नक्शा? दक्षिण भारत की सीटों में बढ़ोतरी के संकेत

लोकसभा परिसीमन पर सियासी हलचल: क्या बदलेगा देश का राजनीतिक नक्शा? दक्षिण भारत की सीटों में बढ़ोतरी के संकेत