यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) द्वारा शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध तेज होता जा रहा है। अलग-अलग राज्यों से छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों और धार्मिक नेताओं की ओर से इन नियमों पर आपत्ति जताई जा रही है। इस विवाद के बीच अयोध्या के जगतगुरु परमहंस आचार्य का बयान सामने आने के बाद मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

जगतगुरु परमहंस आचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर यूजीसी के नए नियमों को तत्काल वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इन नियमों को वापस नहीं लेती है, तो उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए। उनके इस बयान ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है।
परमहंस आचार्य का कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री से स्पष्ट शब्दों में आग्रह किया है कि या तो यूजीसी के नए नियमों को रद्द किया जाए या फिर उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति प्रदान की जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नियमों के लागू होने से समाज में तनाव और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत निर्दोष सवर्ण छात्रों को भी झूठे मामलों में फंसाए जाने का खतरा बढ़ जाएगा। उनका आरोप है कि यदि कोई व्यक्ति झूठी शिकायत करता है, तो उसके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई का प्रावधान नहीं है, जिससे कानून का दुरुपयोग होगा। परमहंस आचार्य ने चेतावनी दी कि इससे अपराध बढ़ सकते हैं और समाज में जातिगत टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
जगतगुरु परमहंस आचार्य ने सरकार को 40 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि इस अवधि में नियमों को वापस नहीं लिया गया, तो वे अपने फैसले पर अडिग रहेंगे। उन्होंने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री से और सरकार से देशहित में बड़े फैसलों की उम्मीद थी, लेकिन यह कानून देश को अशांति की ओर ले जा सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि समय रहते इस कानून को नहीं रोका गया, तो देशभर में दंगे, सामाजिक तनाव और अत्याचार की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जिन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो जाएगा। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक दलों और प्रशासनिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं आने की संभावना बढ़ गई है।
इधर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ छात्र आंदोलन तेज हो गया है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय (डीडीयू) के छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर एकत्र होकर जोरदार प्रदर्शन किया। छात्रों ने नारेबाजी करते हुए इन नियमों को सवर्ण छात्रों के खिलाफ बताया।
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि यूजीसी के नए नियम एकतरफा हैं और इससे शिक्षा संस्थानों में भय का माहौल बनेगा। छात्रों ने सरकार पर आरोप लगाया कि बिना व्यापक चर्चा के नियम लागू किए गए हैं। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने प्रतीकात्मक रूप से खून से पत्र लिखकर सरकार से नियम वापस लेने की मांग भी की।
छात्र संगठनों का कहना है कि वे किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव के खिलाफ हैं, लेकिन कानून ऐसा होना चाहिए जिससे किसी निर्दोष को सजा न मिले और शिकायत की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो। उनका कहना है कि यदि नियमों में संशोधन नहीं किया गया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
फिलहाल यूजीसी के नए नियमों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार और यूजीसी इस बढ़ते विवाद पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इन नियमों में किसी तरह का बदलाव किया जाता है या नहीं।

















