NFHS-6 रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता: बच्चों के पोषण और महंगाई की दोहरी चुनौती से जूझ रहा भारत

भारत में बच्चों के पोषण और देश की आर्थिक स्थिति को लेकर सामने आई हालिया रिपोर्टों ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के आंकड़ों ने जहां छोटे बच्चों के खानपान और स्तनपान से जुड़ी चिंाजनक तस्वीर दिखाई है, वहीं वित्त मंत्रालय ने वैश्विक हालात और महंगाई के दबाव को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बताई है। इन दोनों मुद्दों का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी, स्वास्थ्य और भविष्य पर पड़ने वाला है।

 

छोटे बच्चों को नहीं मिल पा रहा पर्याप्त पोषण

NFHS-6 के अनुसार, देश में 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त और संतुलित भोजन मिल पा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह उम्र बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे समय में पोषण की कमी भविष्य में कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।

रिपोर्ट में सामने आया कि कई परिवारों में भोजन की उपलब्धता तो बढ़ी है, लेकिन बच्चों को सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल रहे। इसका मतलब यह है कि बच्चे पेट भर भोजन तो कर रहे हैं, लेकिन उनके शरीर को विकास के लिए जरूरी पोषण नहीं मिल पा रहा।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती वर्षों में पोषण की कमी बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता, सीखने की क्षमता और शारीरिक विकास पर लंबे समय तक असर डाल सकती है। ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप से देखी जा रही है।

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स्तनपान में गिरावट बनी चिंता का विषय

NFHS-6 की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि छह महीने तक केवल मां का दूध पीने वाले बच्चों की संख्या में कमी आई है। पहले जहां यह आंकड़ा 63.7 प्रतिशत था, अब घटकर 55.8 प्रतिशत रह गया है।

डॉक्टरों के अनुसार, जन्म के बाद शुरुआती छह महीने तक केवल स्तनपान बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित और पोषक आहार माना जाता है। मां के दूध में ऐसे पोषक तत्व और एंटीबॉडी मौजूद होते हैं जो बच्चे को संक्रमण और कई बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलती जीवनशैली, कामकाजी महिलाओं की बढ़ती जिम्मेदारियां, जागरूकता की कमी और शहरी जीवन का दबाव इस गिरावट की प्रमुख वजहें हो सकती हैं। कई स्वास्थ्य संगठनों ने सरकार से स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए नए जागरूकता अभियान चलाने की मांग की है।

हालांकि रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। छह से आठ महीने के बच्चों को स्तनपान के साथ ठोस और अर्ध-ठोस भोजन देने की संख्या बढ़ी है। पहले यह आंकड़ा 45.9 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 59.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। विशेषज्ञ इसे बेहतर जागरूकता का संकेत मान रहे हैं।

 

मोटापा और डायबिटीज का बढ़ता खतरा

रिपोर्ट में बच्चों और वयस्कों में बढ़ते मोटापे को लेकर भी चिंता जताई गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि खराब खानपान, फास्ट फूड की बढ़ती आदत और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण मोटापा तेजी से बढ़ रहा है।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अधिक वजन और मोटापा टाइप-2 डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण बन सकते हैं। शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने से इंसुलिन ठीक से काम नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर नियंत्रित करने में परेशानी होती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर हृदय रोग, किडनी की बीमारी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

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अर्थव्यवस्था पर भी बढ़ा दबाव

इसी बीच वित्त मंत्रालय ने अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में वैश्विक हालात को लेकर चिंता जताई है। मंत्रालय का कहना है कि दुनिया के कई देशों में बढ़ती महंगाई, कमजोर आर्थिक वृद्धि और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर भारत पर भी पड़ सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक बाजारों में अस्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती हैं। मंत्रालय ने माना कि देश की आर्थिक बुनियाद अभी मजबूत है, लेकिन आने वाले समय में सतर्क रहने की जरूरत होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर महंगाई लगातार बढ़ती रही तो इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ेगा। खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से पोषण संबंधी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं, क्योंकि कई परिवार पौष्टिक भोजन खरीदने में सक्षम नहीं रहेंगे।

 

बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना सबसे बड़ी चुनौती

स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ी ये रिपोर्टें साफ संकेत देती हैं कि केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त नहीं है। देश के बच्चों को स्वस्थ और पोषित बनाना भी उतना ही जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, समाज और परिवारों को मिलकर बच्चों के पोषण, स्तनपान और स्वस्थ खानपान को प्राथमिकता देनी होगी।

अगर समय रहते इन चुनौतियों पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ बढ़ सकता है और देश की नई पीढ़ी का विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि पोषण जागरूकता, स्वास्थ्य सुविधाओं और आर्थिक स्थिरता पर एक साथ काम किया जाए, ताकि भारत का भविष्य मजबूत और स्वस्थ बन सके।

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Reference The Hindu

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