औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार में गिरावट, नए आंकड़ों ने बदली तस्वीर

मुंबई:

भारत के औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े ताजा आंकड़ों ने अर्थव्यवस्था की गति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) के नए आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2025 में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर घटकर 4.9 प्रतिशत रह गई। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम है, जब यह दर लगभग 5.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी।

सरकार द्वारा जारी नए डेटा सीरीज में आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है। इस बदलाव के बाद कई क्षेत्रों के आंकड़ों में नई संरचना और व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देश की वास्तविक औद्योगिक स्थिति को अधिक सटीक तरीके से समझने में मदद मिलेगी।

 

नए आधार वर्ष से बदला औद्योगिक तस्वीर का आकलन

सरकार ने औद्योगिक उत्पादन मापने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंडेक्स में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। नई श्रृंखला के तहत अब अर्थव्यवस्था के नए क्षेत्रों और आधुनिक उद्योगों को भी शामिल किया गया है। इससे औद्योगिक गतिविधियों की गणना पहले से अधिक व्यापक और वास्तविक मानी जा रही है।

नई व्यवस्था में जल आपूर्ति, सीवरेज, कचरा प्रबंधन और पर्यावरणीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार अब पारंपरिक उद्योगों के साथ-साथ सेवा आधारित और पर्यावरण से जुड़े क्षेत्रों को भी आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है।

 

खनन और विनिर्माण क्षेत्र में कमजोरी

ताजा आंकड़ों के अनुसार खनन और खदान क्षेत्र में उत्पादन में 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। वहीं विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार भी धीमी रही। हालांकि बिजली क्षेत्र में कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन यह समग्र औद्योगिक वृद्धि को मजबूत करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा।

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विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, कच्चे माल की लागत और घरेलू मांग में उतार-चढ़ाव का असर औद्योगिक उत्पादन पर दिखाई दे रहा है। कई उद्योग अभी भी लागत बढ़ने और बाजार की धीमी मांग जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

 

GDP आंकड़ों पर भी पड़ेगा असर

नई IIP श्रृंखला को देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़ों के साथ भी जोड़ा जाएगा। इससे भविष्य में आर्थिक विकास दर की गणना अधिक आधुनिक और सटीक आधार पर हो सकेगी।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार आधार वर्ष बदलने का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था में हुए संरचनात्मक बदलावों को सही तरीके से प्रतिबिंबित करना है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में कई नए उद्योग उभरे हैं, जिनका पुरानी श्रृंखला में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था।

 

उद्योगों की नई सूची और बढ़ी निगरानी

नई डेटा श्रृंखला में उत्पादों और उद्योगों की संख्या भी बढ़ाई गई है। पहले की तुलना में अब अधिक वस्तुओं और उत्पादन गतिविधियों को ट्रैक किया जाएगा। इससे सरकार और नीति निर्माताओं को विभिन्न क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

सरकारी अधिकारियों के मुताबिक नई प्रणाली में सैकड़ों नए उत्पादों और औद्योगिक इकाइयों को शामिल किया गया है। इससे आर्थिक गतिविधियों की निगरानी पहले की तुलना में अधिक विस्तृत स्तर पर संभव होगी।

 

निवेश और रोजगार पर नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक वृद्धि में कमी का असर रोजगार और निजी निवेश पर भी पड़ सकता है। यदि उत्पादन की गति लगातार धीमी रहती है तो कंपनियां नए निवेश को लेकर सतर्क रुख अपना सकती हैं।

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हालांकि कई अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि आधार वर्ष में बदलाव के शुरुआती चरण में आंकड़ों में उतार-चढ़ाव सामान्य बात होती है। आने वाले महीनों के आंकड़े यह तय करेंगे कि यह गिरावट अस्थायी है या फिर उद्योग क्षेत्र में लंबे समय की सुस्ती का संकेत।

 

सरकार की रणनीति पर बढ़ा फोकस

औद्योगिक विकास को गति देने के लिए सरकार पहले ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं, बुनियादी ढांचे में निवेश और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने की दिशा में कई कदम उठा चुकी है। अब नई IIP श्रृंखला के बाद यह देखने वाली बात होगी कि इन योजनाओं का असर आगामी महीनों में कितना दिखाई देता है।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि भारत की दीर्घकालिक विकास क्षमता अभी भी मजबूत बनी हुई है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्र को स्थिर और तेज रफ्तार देने के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन और मांग बढ़ाने वाले कदम जरूरी होंगे।

Reference The Hindu

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