सुप्रीम कोर्ट पहुंचा CBSE का तीन-भाषा नियम, अभिभावकों और छात्रों ने जताई चिंता

नई दिल्ली:

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए लागू किए गए तीन-भाषा नियम को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। देशभर के कई अभिभावकों और छात्रों ने इस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अचानक लागू किए गए इस फैसले से छात्रों पर अतिरिक्त पढ़ाई का दबाव बढ़ेगा और बोर्ड परीक्षा की तैयारी प्रभावित हो सकती है।

दरअसल, CBSE ने हाल ही में एक सर्कुलर जारी करते हुए कहा था कि जुलाई से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा। नए नियम के अनुसार, पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी हैं। इस निर्णय को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE 2023) का हिस्सा बताया गया है।

 

छात्रों पर बढ़ेगा मानसिक दबाव

याचिका में कहा गया है कि जिन छात्रों ने अब तक केवल दो भाषाओं के साथ पढ़ाई की है, उन्हें अचानक नई भाषा सीखने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। अभिभावकों का तर्क है कि कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा नजदीक होने के कारण छात्रों पर पहले से ही पढ़ाई का दबाव है। ऐसे समय में अतिरिक्त भाषा जोड़ना बच्चों की मानसिक स्थिति और प्रदर्शन दोनों को प्रभावित कर सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि छात्रों को अचानक नई भाषा पढ़ने के लिए कहना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि कई छात्र पहले से ही प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कूल के बढ़ते सिलेबस के कारण तनाव में हैं।

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सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई की मांग

याचिकाकर्ताओं ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगले सप्ताह उपयुक्त पीठ के सामने सूचीबद्ध करने की बात कही है। अब सभी की नजरें अदालत के आगामी फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह फैसला लाखों छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित कर सकता है।

 

CBSE ने दी सफाई

विवाद बढ़ने के बाद CBSE ने अपनी ओर से स्पष्टीकरण भी जारी किया है। बोर्ड ने कहा कि तीसरी भाषा के लिए अलग से बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। छात्रों का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा और यह पूरी तरह आंतरिक प्रक्रिया होगी।

CBSE के अनुसार, स्कूल अपनी सुविधानुसार भाषाओं का चयन कर सकते हैं, लेकिन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य रहेगा। विदेशी भाषाओं को केवल तीसरी या वैकल्पिक चौथी भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकेगा।

 

शिक्षा विशेषज्ञों की राय भी बंटी

इस मुद्दे पर शिक्षा विशेषज्ञों की राय अलग-अलग नजर आ रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए यह कदम जरूरी है। उनका कहना है कि मातृभाषा और भारतीय भाषाओं का ज्ञान छात्रों के बौद्धिक विकास में मदद करता है।

वहीं दूसरी ओर, कई शिक्षाविदों का कहना है कि नीति लागू करने से पहले छात्रों और स्कूलों को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था। अचानक बदलाव से स्कूलों में शिक्षकों की कमी और पाठ्यक्रम प्रबंधन जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

 

अभिभावकों में बढ़ी चिंता

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नई नीति को लेकर कई माता-पिता असमंजस में हैं। कुछ अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चों ने अब तक विदेशी भाषा को प्राथमिकता दी थी और अब अचानक भारतीय भाषा जोड़ने से पढ़ाई की योजना पूरी तरह बदल जाएगी। खासकर महानगरों के स्कूलों में यह मुद्दा अधिक चर्चा में है।

 

फिलहाल, देशभर के छात्र और अभिभावक सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मामला शिक्षा व्यवस्था और भाषा नीति पर बड़ी बहस का कारण बन सकता है।

Reference The Hindu report

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