नई दिल्ली:
देशद्रोह कानून को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी को आपत्ति नहीं है, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A यानी देशद्रोह से जुड़े मामलों की सुनवाई आगे बढ़ाई जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में निचली अदालतें कानून के अनुसार फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब देशद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने उन मामलों में नई दिशा दी है, जिनकी सुनवाई लंबे समय से रुकी हुई थी।
क्या है पूरा मामला?
साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह ब्रिटिश दौर के इस कानून पर दोबारा विचार करे। इसके बाद अदालत ने देशभर में चल रहे देशद्रोह के मामलों पर अस्थायी रोक लगा दी थी। साथ ही सरकार से यह भी अपेक्षा जताई गई थी कि नए मामले दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने में सावधानी बरती जाए।
अब सुप्रीम Court की नई टिप्पणी में कहा गया है कि यदि किसी आरोपी ने स्वयं सुनवाई जारी रखने पर सहमति दी है, तो अदालतें उस मामले में आगे की कार्रवाई कर सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को लंबित रखना जरूरी नहीं है, खासकर तब जब आरोपी खुद मुकदमे की प्रक्रिया पूरी करवाना चाहता हो।
17 साल से जेल में बंद आरोपी की याचिका
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जो करीब 17 वर्षों से जेल में बंद है और उस पर देशद्रोह सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से अपील की थी कि उसके मामले की सुनवाई जारी रखने की अनुमति दी जाए, क्योंकि वह लंबे समय से न्याय का इंतजार कर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि यदि आरोपी को सुनवाई पर कोई आपत्ति नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट इस मामले में कानून के अनुसार फैसला ले सकती है।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि देशद्रोह कानून पर अंतिम फैसला अभी बाकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले की सुनवाई पूरी तरह रोक दी जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को मामले के तथ्यों और कानून के आधार पर फैसला लेने की स्वतंत्रता है। इससे यह संकेत मिला है कि देशद्रोह कानून पर अंतिम निर्णय आने तक कुछ मामलों में सुनवाई जारी रह सकती है।
देशद्रोह कानून पर क्यों हो रही है बहस?
धारा 124A को अंग्रेजों के समय लागू किया गया था। इस कानून का उद्देश्य उस दौर में सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को नियंत्रित करना था। लंबे समय से इस कानून को लेकर विवाद चलता रहा है। कई सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और राजनीतिक दलों का कहना है कि इस कानून का दुरुपयोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए किया जाता है।
वहीं सरकार का पक्ष है कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता बनाए रखने के लिए कुछ परिस्थितियों में ऐसे कानून की आवश्यकता पड़ सकती है।
नए कानून में भी शामिल है समान प्रावधान
हाल ही में लागू किए गए भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) में भी देशविरोधी गतिविधियों से संबंधित प्रावधान जोड़े गए हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि नए कानून में पुराने प्रावधानों को अलग तरीके से परिभाषित किया गया है और इसका उद्देश्य केवल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर कार्रवाई करना है।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि पुराने कानून को नए रूप में दोबारा लागू किया गया है। इसी कारण इस मुद्दे पर कानूनी बहस अभी भी जारी है।
आगे क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला देशद्रोह कानून के भविष्य को तय करेगा। यदि अदालत इस कानून को असंवैधानिक घोषित करती है, तो देशभर में चल रहे कई मामलों पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर अदालत कुछ शर्तों के साथ इसे बरकरार रखती है, तो सरकार और अदालतों को इसके इस्तेमाल के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने पड़ सकते हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी उन आरोपियों के लिए राहत मानी जा रही है, जो वर्षों से अपने मामलों की सुनवाई पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं।
Reference The Hindu