बिहार
भारत की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत में मैथिली भाषा का एक विशेष स्थान रहा है। अब इस भाषा को देश की मुख्य शिक्षा व्यवस्था में सम्मान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। बिहार सरकार ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से मांग की है कि मैथिली भाषा को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इस पहल को मिथिला क्षेत्र के लोगों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों ने ऐतिहासिक कदम बताया है।
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर जोर देती है। ऐसे में मैथिली जैसी समृद्ध और संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषा को CBSE पाठ्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि मैथिली केवल एक भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान और विरासत है।
मैथिली भाषा का इतिहास सदियों पुराना है। यह भाषा साहित्य, लोककला, गीत-संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में बेहद समृद्ध मानी जाती है। प्रसिद्ध कवि विद्यापति की रचनाओं ने मैथिली को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। बिहार और नेपाल के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग आज भी मैथिली बोलते हैं। इसके बावजूद आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में इस भाषा को वह स्थान नहीं मिल पाया जिसकी यह हकदार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि CBSE में मैथिली को शामिल किया जाता है, तो लाखों छात्रों को अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करने और परीक्षा देने का अवसर मिलेगा। इससे बच्चों की सीखने की क्षमता बेहतर होगी और वे अपनी भाषा एवं संस्कृति से अधिक जुड़ाव महसूस करेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी इससे बड़ा लाभ मिल सकता है, क्योंकि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने से समझ और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं।
नई शिक्षा नीति 2020 में भी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। इसी आधार पर बिहार सरकार ने केंद्र से आग्रह किया है कि मैथिली को भी CBSE के भाषा विषयों की सूची में शामिल किया जाए। राज्य सरकार का मानना है कि यह कदम भारतीय भाषाओं के संरक्षण और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
मिथिला क्षेत्र के सामाजिक संगठनों और भाषा प्रेमियों ने इस मांग का जोरदार समर्थन किया है। उनका कहना है कि मैथिली पहले से ही भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है, इसलिए इसे शिक्षा व्यवस्था में समान महत्व मिलना चाहिए। कई शिक्षकों का भी मानना है कि इससे विद्यार्थियों में भाषा के प्रति गर्व की भावना विकसित होगी और भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
यदि केंद्र सरकार इस मांग को स्वीकार करती है, तो यह केवल बिहार ही नहीं बल्कि पूरे मिथिला क्षेत्र के लिए गर्व का विषय होगा। इससे क्षेत्रीय भाषाओं को नई पहचान मिलेगी और भारतीय शिक्षा व्यवस्था अधिक समावेशी बन सकेगी। आने वाले समय में यह निर्णय देश की अन्य भाषाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।
मैथिली को CBSE पाठ्यक्रम में शामिल करने की यह पहल केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और पहचान को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं, जिससे लाखों मैथिली भाषियों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
Reference The Hindu