भारत में बाल मृत्यु दर में गिरावट, लेकिन रफ्तार धीमी: नई रिपोर्ट

नई दिल्ली: भारत में बच्चों की मृत्यु दर में पिछले कुछ दशकों में लगातार कमी दर्ज की गई है, लेकिन अब इस सुधार की गति धीमी पड़ती दिख रही है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा है कि प्रगति तो हो रही है, लेकिन अपेक्षित तेजी से नहीं।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनियाभर में लगभग 49 लाख बच्चों की मृत्यु पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले हो गई। इनमें से करीब 23 लाख नवजात शिशु थे, जिनकी मृत्यु जन्म के पहले महीने में ही हो गई। यह आंकड़े बताते हैं कि नवजात देखभाल अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

 

भारत में सुधार, लेकिन चुनौती बरकरार

भारत ने बीते तीन दशकों में बाल मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है।

1990 में जहां नवजात मृत्यु दर (NMR) लगभग 57 प्रति 1,000 जीवित जन्म थी, वहीं 2024 तक यह घटकर करीब 17 रह गई है।

इसी तरह, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) भी 127 से घटकर काफी नीचे आ गई है।

हालांकि, 2015 के बाद इस गिरावट की गति में कमी देखी गई है। पहले जहां तेजी से सुधार हो रहा था, अब प्रगति धीमी पड़ गई है।

स्वास्थ्य सेवाओं का असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार सरकार की कई योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का परिणाम है।

संस्थागत प्रसव (हॉस्पिटल में डिलीवरी) बढ़े हैं

टीकाकरण अभियान का दायरा बढ़ा है

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बेहतर हुई है

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इन्हीं कारणों से लाखों बच्चों की जान बचाई जा सकी है। लेकिन अब आगे की राह और कठिन हो गई है, क्योंकि बाकी बची चुनौतियाँ ज्यादा जटिल हैं।

 

मौत के प्रमुख कारण

रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चों की मौत के पीछे कई कारण हैं:

समय से पहले जन्म (Preterm birth)

प्रसव के दौरान जटिलताएं

संक्रमण और निमोनिया

कुपोषण

विशेष रूप से नवजात शिशुओं में पहले महीने के भीतर मृत्यु का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

 

वैश्विक तस्वीर और भारत की स्थिति

दक्षिण एशिया में भारत ने अच्छी प्रगति दिखाई है, लेकिन अब भी सुधार की काफी गुंजाइश है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच में और सुधार किया जाए, तो आने वाले वर्षों में मृत्यु दर को और कम किया जा सकता है।

 

विशेषज्ञों की राय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल योजनाएं बनाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें ज़मीन पर प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है। ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

 

 एक मानवीय पहलू

इन आंकड़ों के पीछे लाखों परिवारों की कहानियाँ छिपी हैं—मां-बाप के अधूरे सपने, और उन बच्चों की जिंदगी जो बेहतर देखभाल मिलने पर बचाई जा सकती थी। यही वजह है कि यह मुद्दा सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता से भी जुड़ा है।

 

भारत ने बाल मृत्यु दर को कम करने में लंबा सफर तय किया है, लेकिन अभी मंजिल दूर है।

धीमी पड़ती प्रगति यह संकेत देती है कि अब और अधिक ध्यान, संसाधन और ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि हर बच्चे को सुरक्षित और स्वस्थ जीवन का अधिकार मिल सके।

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