महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात चिंता का विषय, सुधार के बावजूद राष्ट्रीय औसत से पीछे

मुंबई

महाराष्ट्र में स्वास्थ्य सेवाओं और मातृ-शिशु देखभाल के क्षेत्र में प्रगति दर्ज की गई है, लेकिन जन्म के समय लड़कियों और लड़कों के अनुपात को लेकर राज्य की स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022-24 के दौरान महाराष्ट्र में प्रति 1000 लड़कों पर केवल 899 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। यह आंकड़ा एक दशक पहले की तुलना में थोड़ा बेहतर है, लेकिन राष्ट्रीय औसत से काफी कम बना हुआ है।

 

राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे महाराष्ट्र

रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र का जन्म लिंगानुपात 2012-14 में 896 था, जो अब बढ़कर 899 तक पहुंचा है। हालांकि यह सुधार सकारात्मक संकेत देता है, लेकिन देश का औसत 918 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों का है। ऐसे में महाराष्ट्र अभी भी उन राज्यों में शामिल है जहां जन्म के समय लड़कियों की संख्या अपेक्षाकृत कम दर्ज की जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि लिंगानुपात केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह समाज में महिलाओं की स्थिति, लैंगिक समानता और सामाजिक सोच को भी दर्शाता है। इसलिए मामूली सुधार के बावजूद यह स्थिति राज्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों ने दिखाई प्रगति, शहरों में स्थिति बिगड़ी

रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि ग्रामीण महाराष्ट्र में लिंगानुपात में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 888 से बढ़कर 910 तक पहुंच गया।

इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में स्थिति कमजोर हुई है। शहरों में जन्म के समय लिंगानुपात 908 से घटकर 885 पर पहुंच गया। यह संकेत देता है कि आधुनिक सुविधाओं और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के बावजूद शहरी इलाकों में लैंगिक संतुलन को लेकर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।

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सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि आमतौर पर शहरों को लैंगिक समानता के मामले में बेहतर माना जाता है, लेकिन आंकड़े इस धारणा को चुनौती देते हैं। शहरी क्षेत्रों का खराब प्रदर्शन ग्रामीण इलाकों में हुए सुधार के प्रभाव को काफी हद तक कम कर रहा है।

 

देश में क्या है स्थिति?

राष्ट्रीय स्तर पर एक दिलचस्प प्रवृत्ति देखने को मिली है। जहां पहले ग्रामीण क्षेत्रों में लिंगानुपात अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता था, वहीं अब शहरी भारत में जन्म के समय लड़कियों की संख्या ग्रामीण भारत की तुलना में अधिक दर्ज की जा रही है।

 

देश के विभिन्न राज्यों की तुलना करें तो छत्तीसगढ़ और केरल ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। छत्तीसगढ़ में प्रति 1000 लड़कों पर 978 लड़कियां और केरल में 974 लड़कियां दर्ज की गईं। ये दोनों राज्य लैंगिक संतुलन के मामले में देश के लिए उदाहरण बनकर उभरे हैं।

 

दूसरी ओर उत्तराखंड में सबसे कम लिंगानुपात दर्ज किया गया, जहां यह आंकड़ा 872 रहा। महाराष्ट्र भी सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहा। बिहार में यह संख्या 896, हरियाणा में 885 और दिल्ली में 876 दर्ज की गई।

 

किन राज्यों ने बेहतर संतुलन बनाए रखा?

कुछ राज्यों ने लगातार संतुलित लिंगानुपात बनाए रखा है। हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा 956 दर्ज किया गया, जबकि आंध्र प्रदेश और असम में 946-946 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों पर दर्ज की गईं। इन राज्यों का प्रदर्शन दर्शाता है कि सामाजिक जागरूकता और प्रभावी सरकारी योजनाएं सकारात्मक परिणाम दे सकती हैं।

 

स्वास्थ्य सेवाओं में महाराष्ट्र की उपलब्धियां

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लिंगानुपात के मोर्चे पर चुनौतियां होने के बावजूद महाराष्ट्र ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं और बच्चों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।

विशेष रूप से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों, अस्पतालों तक पहुंच, प्रसव सेवाओं और टीकाकरण व्यवस्था में सुधार के परिणाम सामने आए हैं। यही कारण है कि राज्य में शिशु मृत्यु दर में भी लगातार कमी दर्ज की गई है।

 

प्रजनन दर में गिरावट

रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) 1.4 बच्चों प्रति महिला दर्ज की गई है। यह राष्ट्रीय औसत 1.9 से काफी कम है और देश के सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्यों में महाराष्ट्र की गिनती होती है।

तुलना के तौर पर बिहार में प्रजनन दर 2.9 दर्ज की गई, जो देश में सबसे अधिक है। वहीं दिल्ली में यह आंकड़ा 1.2 रहा, जो सबसे कम स्तरों में शामिल है।

जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि कम प्रजनन दर का अर्थ है कि परिवार छोटे हो रहे हैं और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ रही है। हालांकि अत्यधिक कम प्रजनन दर भविष्य में जनसंख्या संरचना को प्रभावित कर सकती है।

 

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रजनन दर का अंतर

रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रजनन दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक बनी हुई है। ग्रामीण महाराष्ट्र में प्रति महिला औसतन 1.5 बच्चों का आंकड़ा दर्ज किया गया, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 1.3 रहा।

यह अंतर शिक्षा, रोजगार, जीवनशैली और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता जैसे कारकों से जुड़ा माना जा रहा है।

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शिशु मृत्यु दर में आई बड़ी कमी

महाराष्ट्र के लिए सबसे राहत भरी खबर शिशु मृत्यु दर में आई गिरावट है। रिपोर्ट बताती है कि 2012-14 में जहां शिशु मृत्यु दर 23.6 प्रतिशत थी, वहीं 2022-24 में यह घटकर 13.5 प्रतिशत रह गई।

यह सुधार स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, नवजात शिशुओं की बेहतर देखभाल, अस्पतालों में प्रसव की बढ़ती संख्या और सरकारी योजनाओं के प्रभाव का परिणाम माना जा रहा है।

 

आगे की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि महाराष्ट्र ने स्वास्थ्य सेवाओं और शिशु कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार लाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सामाजिक सोच में बदलाव, बेटियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर लगातार काम करना होगा।

राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में मिली उपलब्धियों को सामाजिक सुधारों के साथ जोड़ते हुए लड़कियों के जन्म को लेकर मौजूद असंतुलन को दूर किया जाए। तभी महाराष्ट्र वास्तविक अर्थों में समावेशी और संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

Reference The Hindu

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