भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर हाल ही में सामने आए रिजर्व बैंक के आंकड़ों ने सरकार और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश का “बैलेंस ऑफ पेमेंट” (BoP) भारी घाटे में पहुंच गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत से बाहर जाने वाला विदेशी मुद्रा प्रवाह, देश में आने वाले डॉलर से कहीं ज्यादा रहा।
रिपोर्ट बताती है कि इस दौरान भारत का बैलेंस ऑफ पेमेंट घाटा लगभग 30.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में कई गुना अधिक है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर रुपये की मजबूती, विदेशी मुद्रा भंडार और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
क्या होता है बैलेंस ऑफ पेमेंट?
बैलेंस ऑफ पेमेंट किसी भी देश के आर्थिक लेनदेन का पूरा हिसाब होता है। इसमें यह देखा जाता है कि देश में व्यापार, निवेश और सेवाओं के जरिए कितनी विदेशी मुद्रा आई और कितनी बाहर गई।
इसे मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है—
करंट अकाउंट
कैपिटल अकाउंट
करंट अकाउंट में आयात-निर्यात, सेवाओं और अन्य भुगतान शामिल होते हैं, जबकि कैपिटल अकाउंट में विदेशी निवेश, कर्ज और पूंजी से जुड़े लेनदेन आते हैं।
भारत में क्यों बढ़ा घाटा?
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इस बार घाटा बढ़ने की सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेश में आई गिरावट और डॉलर का तेज बहिर्वाह रहा। विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाला, जिससे पूंजी खाते पर दबाव बढ़ गया।
इसके अलावा भारत का आयात खर्च भी लगातार ऊंचा बना हुआ है। खासतौर पर कच्चे तेल और सोने के आयात ने विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त बोझ डाला है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसके कारण डॉलर की मांग बढ़ती रहती है।
विदेशी निवेशकों ने क्यों निकाला पैसा?
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से धन निकालना शुरू किया। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में विदेशी निवेशकों ने भारत में जितना निवेश किया, उससे कहीं अधिक राशि वापस निकाल ली।
इसका असर शेयर बाजार और विदेशी मुद्रा बाजार दोनों पर देखने को मिला। जब विदेशी निवेशक पैसा निकालते हैं तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव आता है।
सेवाओं से होने वाली कमाई भी घटी
भारत को आईटी सेवाओं, बिजनेस सर्विसेज और अन्य क्षेत्रों से अच्छी विदेशी कमाई होती रही है। लेकिन इस बार सेवाओं से मिलने वाला अधिशेष भी घट गया। इससे व्यापार घाटे की भरपाई उतनी मजबूत तरीके से नहीं हो पाई जितनी पहले होती थी।
हालांकि भारत का माल व्यापार घाटा पिछले वर्ष की तुलना में कुछ कम हुआ, लेकिन सेवाओं से होने वाली आय में कमी ने स्थिति को कमजोर कर दिया।
सरकार क्यों है चिंतित?
सरकार और आरबीआई की चिंता इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि लगातार डॉलर बाहर जाने से विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ सकता है। यदि विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है तो रुपये की कीमत गिर सकती है और आयात महंगा हो सकता है।
महंगे आयात का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक में महंगाई बढ़ सकती है।
तेल और सोना बने बड़ी वजह
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसके साथ ही भारत में सोने की मांग भी काफी ज्यादा है। त्योहारों और शादियों के मौसम में सोने का आयात और बढ़ जाता है।
इसी कारण बड़ी मात्रा में डॉलर विदेशों में भुगतान के रूप में चला जाता है। सरकार ने हाल ही में सोने और चांदी के आयात पर शुल्क बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए हैं ताकि आयात को नियंत्रित किया जा सके।
विदेशी मुद्रा भंडार पर क्या असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि डॉलर का बहिर्वाह इसी तरह जारी रहा तो आरबीआई को विदेशी मुद्रा भंडार का अधिक इस्तेमाल करना पड़ सकता है। हालांकि भारत के पास अभी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन लंबे समय तक दबाव बने रहने पर चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
आरबीआई पहले भी रुपये को स्थिर रखने के लिए बाजार में डॉलर बेचता रहा है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग बढ़ता है।
आगे क्या हो सकता है?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि विदेशी निवेश दोबारा बढ़ता है और वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो स्थिति में सुधार हो सकता है। साथ ही निर्यात बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में सरकार के कदम भी अहम साबित होंगे।
भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन डॉलर के लगातार बहिर्वाह ने यह संकेत जरूर दिया है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी गहराई से पड़ रहा है।
Reference The Hindu