मौसम की मार से चिंतित लीची किसान: इस बार बागों में कम दिख रहा बौर, उत्पादन घटने की आशंका

मुजफ्फरपुर/बिहार।

उत्तर बिहार की पहचान बन चुकी शाही और चाइना लीची इस साल फिर मौसम की बेरुख़ी का सामना कर रही है। फरवरी के आखिर तक जहां पेड़ों पर घना बौर (मंजर) दिखना चाहिए था, वहीं इस बार बागों में हल्की-फुल्की कलियाँ ही नजर आ रही हैं। बाग मालिकों और किसानों का कहना है कि मौसम में लगातार उतार-चढ़ाव ने फसल की शुरुआत पर ही असर डाल दिया है, जिसके कारण उत्पादन कम होने की संभावना जताई जा रही है।

 

पिछले साल बेहतर स्थिति, इस बार उम्मीद कमजोर

पिछले वर्ष कई इलाकों में करीब 70 प्रतिशत तक पेड़ों पर अच्छी तरह मंजर आया था, जिससे किसानों को बेहतर आमदनी की उम्मीद बनी थी। लेकिन इस बार हालात अलग हैं। बागों का निरीक्षण कर रहे किसानों का कहना है कि लगभग 60 प्रतिशत तक ही बौर आने की संभावना बन रही है। कई पेड़ों में तो अभी भी सिर्फ नई पत्तियाँ निकल रही हैं, जबकि मंजर कमज़ोर और छोटा दिखाई दे रहा है।

 

मौसम का खेल समझिए

. विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार समस्या की शुरुआत दिसंबर से ही हो गई थी।

. दिसंबर में सामान्य से ज्यादा गर्मी रही

. जनवरी में अचानक कड़ाके की ठंड पड़ गई

. फरवरी के पहले पखवाड़े तक तापमान काफी कम रहा और सुबह-सुबह घना कोहरा भी पड़ा

इस अनियमित मौसम ने पेड़ों के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित कर दिया। आमतौर पर ठंड का एक संतुलित दौर लीची के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन बार-बार तापमान बदलने से पेड़ों में नई पत्तियाँ ज्यादा निकलीं और बौर कमजोर रह गया।

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बागों की स्थिति क्या बता रही है

मुजफ्फरपुर के एक किसान ने बताया कि जिन डालियों पर हरी पत्तियाँ ज्यादा हैं, वहां निकलने वाला मंजर छोटा और कमज़ोर है। कुछ पेड़ों में तो बौर बनते-बनते ही रुक गया। इससे फल लगने की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है। किसान अब इस बात को लेकर परेशान हैं कि अगर शुरुआत ही कमजोर रही तो मई-जून में तैयार होने वाली लीची की मात्रा कम हो सकती है।

 

वैज्ञानिकों की राय

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लीची के पेड़ एक खास तापमान और नमी पर बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं। जब सर्दी बहुत लंबी खिंच जाती है या अचानक गर्मी बढ़ जाती है तो पौधा भ्रमित हो जाता है। ऐसे में वह फल देने की बजाय नई पत्तियाँ उगाने में ऊर्जा खर्च करता है। इसी कारण इस साल कई बागों में फूल कम बन रहे हैं।

 

किसानों की चिंता – आमदनी पर असर

लीची उत्तर बिहार के हजारों परिवारों की आजीविका का बड़ा साधन है। शादी-विवाह और बच्चों की पढ़ाई तक का खर्च कई किसान इसी फसल से निकालते हैं। इसलिए बौर कम दिखने से उनकी चिंता बढ़ गई है।

एक किसान ने कहा, “अगर अभी फूल कम रहेगा तो फल भी कम लगेगा। बाजार में दाम अच्छा भी मिला तो मात्रा कम होने से फायदा सीमित ही रहेगा।”

 

क्या हो सकता है आगे?

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर मार्च-अप्रैल में मौसम संतुलित रहा—न ज्यादा गर्मी और न तेज आँधी-बारिश—तो जो मंजर बचा है, उससे कुछ हद तक स्थिति सुधर सकती है। लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि इस साल उत्पादन सामान्य से कम रह सकता है।

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उम्मीद अब भी बाकी

हालांकि किसान पूरी तरह निराश नहीं हैं। वे बागों की अतिरिक्त देखभाल, सिंचाई और पोषण प्रबंधन पर ध्यान दे रहे हैं ताकि जो फूल आए हैं, वे सुरक्षित फल में बदल सकें। ग्रामीण इलाकों में अभी भी रोज सुबह किसान अपने बागों में जाकर पेड़ों को देख रहे हैं और मौसम पर नजर बनाए हुए हैं।

 

मुजफ्फरपुर की लीची सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि इलाके की पहचान और हजारों परिवारों की आजीविका है। मौसम की थोड़ी सी गड़बड़ी पूरे साल की मेहनत पर असर डाल देती है। अब सबकी नजर आने वाले हफ्तों के मौसम पर टिकी है—क्योंकि वही तय करेगा कि इस साल बाजार में लीची की मिठास कितनी होगी और किसानों के चेहरों पर मुस्कान कितनी।

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