कच्छ की आक्रामक झाड़ी से बनेगा हरित ईंधन, भारत का पहला ग्रीन मेथनॉल प्लांट तैयार

नई दिल्ली 

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में पाई जाने वाली एक आक्रामक झाड़ी अब देश के लिए अवसर बनती नजर आ रही है। जिस पौधे को लंबे समय तक पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता था, वही अब स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन में अहम भूमिका निभाने जा रहा है। भारत में पहली बार इस झाड़ी का उपयोग कर ग्रीन मेथनॉल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है।

यह पौधा, जिसे स्थानीय स्तर पर तेजी से फैलने वाला और देशी वनस्पतियों के लिए नुकसानदायक माना जाता है, अब ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोगी संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। वर्षों से कच्छ के बन्नी घासभूमि में फैलकर इसने स्थानीय जैव विविधता को प्रभावित किया है। लेकिन अब वैज्ञानिकों और उद्योगों ने इसे एक समाधान के रूप में अपनाने की योजना बनाई है।

इस परियोजना के तहत इस झाड़ी से बायोमास तैयार किया जाएगा, जिसे प्रोसेस कर ग्रीन मेथनॉल में बदला जाएगा। मेथनॉल एक ऐसा ईंधन है जिसे जहाजों के संचालन में पारंपरिक ईंधन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि आयातित ईंधन पर निर्भरता भी घटेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीन मेथनॉल के इस्तेमाल से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में बड़ी कमी लाई जा सकती है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इस प्लांट को कांडला बंदरगाह के पास स्थापित किया जा रहा है, जहां प्रतिदिन मेथनॉल उत्पादन की क्षमता विकसित की जा रही है। इस पहल में तकनीकी सहयोग और अनुसंधान का बड़ा योगदान है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि उत्पादन प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल रहे।

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सरकार की नीतियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दबाव के चलते अब समुद्री परिवहन क्षेत्र में स्वच्छ ईंधन की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह परियोजना भारत को इस क्षेत्र में अग्रणी बना सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि जिस पौधे को कभी समस्या माना जाता था, वही अब समाधान बनकर उभर रहा है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

कुल मिलाकर, यह पहल न केवल पर्यावरणीय चुनौती का समाधान है, बल्कि भारत के ऊर्जा भविष्य को भी नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।

Reference The Hindu

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