किश्तवाड़ में Anti-terror-operation: ‘अज्राइल ग्रुप’ का अंत, सुरक्षाबलों की रणनीति से टूटा तंत्र

The Newsic | विशेष रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील पहाड़ी जिले किश्तवाड़ में सुरक्षाबलों ने एक बड़े आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त कर निर्णायक सफलता हासिल की है। खुद को “मौत का फरिश्ता” बताने वाला जैश से जुड़ा कमांडर सैफुल्लाह और उसके छह सहयोगी एक संयुक्त ऑपरेशन में मारे गए। यह समूह अपने आप को “अज्राइल ग्रुप” के नाम से पहचान देता था—एक ऐसा नाम जो धार्मिक प्रतीक से जुड़ा है और जिसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक दबाव और भय पैदा करने के लिए किया गया।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह आतंकी मॉड्यूल वर्ष 2024 में सीमा पार से घुसपैठ कर घाटी में सक्रिय हुआ था। दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और ऊंचाई वाले इलाकों को अपना ठिकाना बनाकर यह समूह “हिट एंड रन” रणनीति पर काम करता था। गश्त कर रहे सुरक्षाबलों को ऊंचाई से निशाना बनाना, फिर अचानक स्थान बदल लेना—यही उनकी कार्यप्रणाली थी।

स्थानीय सहयोग और नेटवर्क की परतें

सूत्रों का कहना है कि इस समूह को कुछ स्थानीय सहयोग भी मिलता था। खाने-पीने का सामान, अस्थायी आश्रय और इलाके की भौगोलिक जानकारी—इन सबने आतंकियों को लंबे समय तक सक्रिय बनाए रखने में मदद की। सुरक्षा एजेंसियों ने अब ऐसे ओवर ग्राउंड वर्करों (OGWs) की पहचान शुरू कर दी है, जिनकी भूमिका संदिग्ध पाई गई है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी आतंकी नेटवर्क की रीढ़ उसका स्थानीय समर्थन तंत्र होता है। जब तक यह तंत्र सक्रिय रहता है, तब तक आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह समाप्त करना कठिन होता है। किश्तवाड़ में हालिया कार्रवाई के बाद सुरक्षा बल अब इस सपोर्ट सिस्टम को निष्क्रिय करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

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ऑपरेशन की रणनीति: सटीक खुफिया और संयमित कार्रवाई

इस ऑपरेशन की सफलता के पीछे बहु-स्तरीय खुफिया समन्वय अहम रहा। मानवीय खुफिया (Human Intelligence) और तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance) के जरिए आतंकियों की गतिविधियों को ट्रैक किया गया। ड्रोन सर्विलांस, संचार संकेतों की निगरानी और स्थानीय इनपुट के आधार पर आतंकियों को एक सीमित दायरे में रोकने की रणनीति अपनाई गई।

सेना के जनसंपर्क अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल सुनीत बर्तवाल के अनुसार, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों ने समन्वय बनाए रखा। उन्होंने बताया कि आतंकियों को इस तरह घेरा गया कि उनके भागने के सभी संभावित रास्ते बंद हो जाएं। संयम और पेशेवर रणनीति के साथ चलाए गए इस अभियान ने आतंकी नेटवर्क को गहरा आघात पहुंचाया है।

क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव

किश्तवाड़, डोडा और आसपास के पहाड़ी इलाके लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं। सीमावर्ती गतिविधियां और जंगलों की आड़ आतंकियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करती रही हैं। ऐसे में इस ऑपरेशन को सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा रणनीति की सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्रवाई से आतंकी संगठनों को स्पष्ट संदेश गया है कि किसी भी प्रकार की घुसपैठ या स्थानीय नेटवर्क के जरिए सक्रिय रहने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि सतर्कता बनाए रखना उतना ही जरूरी है, क्योंकि ऐसे नेटवर्क अक्सर नए मॉड्यूल तैयार करने की कोशिश करते हैं।

शांति, विकास और विश्वास की जरूरत

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं होती। स्थायी शांति के लिए स्थानीय समुदाय का विश्वास, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और क्षेत्रीय विकास की गति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किश्तवाड़ जैसे इलाकों में शिक्षा, बुनियादी ढांचे और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा हो सकता है।

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सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जब स्थानीय समाज आतंक के खिलाफ खुलकर खड़ा होता है, तब आतंकी संगठनों की जड़ें स्वतः कमजोर पड़ जाती हैं। हालिया कार्रवाई के बाद प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की कोशिश होगी कि क्षेत्र में विश्वास बहाली और संवाद को भी मजबूत किया जाए।

आगे की राह

सुरक्षा बलों का अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है। बचे हुए संभावित मॉड्यूल और संदिग्ध सहयोगियों की तलाश जारी है। खुफिया तंत्र को और सुदृढ़ किया गया है ताकि भविष्य में किसी भी घुसपैठ या हमले की साजिश को शुरुआती स्तर पर ही विफल किया जा सके।

The Newsic की यह विशेष रिपोर्ट दर्शाती है कि समन्वित रणनीति, सटीक खुफिया जानकारी और जमीनी साहस के बल पर सुरक्षाबलों ने एक खतरनाक नेटवर्क को खत्म किया है। यह कार्रवाई न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में भी एक मजबूत कदम मानी जा रही है।

Ayush Mishra

journalist

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