भारत की न्याय व्यवस्था समय-समय पर समाज के साथ कदम मिलाकर खुद को सुधारती रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अदालतों में महिलाओं से जुड़े पुराने और पक्षपाती नजरियों को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब अदालतों में फैसले देते समय ऐसी भाषा और तर्कों से बचने पर जोर दिया जा रहा है जो महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाते हों।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने पहले जारी की गई जेंडर संबंधी गाइडबुक को फिर से देखने का निर्णय लिया है। अदालत का मानना है कि कई बार फैसलों में इस्तेमाल होने वाले शब्द और सोच सामाजिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित होते हैं, जिससे न्याय की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है।
इसलिए न्यायाधीशों को संवेदनशील भाषा अपनाने और मामलों को पीड़ित के दृष्टिकोण से समझने की सलाह दी गई है।
क्यों ज़रूरी पड़ा बदलाव?
अदालत के सामने कई ऐसे उदाहरण आए, जिनमें फैसलों के दौरान महिलाओं के व्यवहार, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन को आधार बनाकर टिप्पणियां की गईं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
किसी महिला का पहनावा या जीवनशैली अपराध का कारण नहीं माना जा सकता
. पीड़िता का चरित्र न्याय का आधार नहीं हो सकता
. न्यायिक टिप्पणी हमेशा सम्मानजनक होनी चाहिए
. इस कदम का उद्देश्य अदालतों को अधिक मानवीय और संवेदनशील बनाना है।
“हार्वर्ड-टाइप” सोच पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि केवल कानूनी तकनीकी शब्दों या विदेशी उदाहरणों पर आधारित व्याख्या पर्याप्त नहीं होती। भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
यानी कानून सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लागू किया जाएगा।
2023 की गाइडबुक में क्या था?
पहले जारी दिशा-निर्देशों में न्यायाधीशों को सलाह दी गई थी कि वे फैसलों में ऐसी भाषा न इस्तेमाल करें जो महिलाओं को कमतर या भावनात्मक रूप से कमजोर दर्शाए।
इसमें यह भी बताया गया था कि:
. यौन हिंसा के मामलों में पीड़िता के व्यवहार को संदेह का आधार न बनाया जाए
. “चरित्र” या “सम्मान” जैसे शब्दों से बचा जाए
. अदालत का व्यवहार पीड़ित-केंद्रित होना चाहिए
आगे क्या होगा?
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी अब विशेषज्ञों की मदद से नए दिशा-निर्देश तैयार करेगी और न्यायाधीशों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। उद्देश्य साफ है — अदालतों में फैसले कानून के साथ-साथ संवेदनशीलता और सम्मान पर आधारित हों।
यह पहल केवल न्यायपालिका का सुधार नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने की दिशा में भी अहम कदम है। जब अदालतें निष्पक्ष और सम्मानजनक भाषा अपनाएंगी, तो लोगों का भरोसा न्याय व्यवस्था पर और मजबूत होगा।
















