पटना,
बिहार सरकार ने शहरी इलाकों में बिना लाइसेंस खुले में मांस और मछली बेचने पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम से शहरों में सफाई व्यवस्था बेहतर होगी और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ कम होंगी। हालांकि, विशेषज्ञों और व्यापारियों का मानना है कि इस आदेश को जमीन पर लागू करना आसान नहीं रहने वाला।
क्या है सरकार का आदेश?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला लोगों के खाने-पीने की आदतों को प्रभावित करने के लिए नहीं है। यानी मांस या मछली खाने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। रोक सिर्फ उन दुकानों और ठेलों पर है जो सड़कों, बाजारों या सार्वजनिक जगहों पर खुले में बिना अनुमति बिक्री करते हैं।
अब मांस की बिक्री केवल लाइसेंस प्राप्त दुकानों में ही की जा सकेगी। दुकानदारों को साफ-सफाई के नियमों का पालन करना होगा। दुकानों में कचरा निपटान की उचित व्यवस्था, ढके हुए काउंटर और बाहर से दिखाई न देने वाली व्यवस्था रखना अनिवार्य होगा।
दुकानदारों पर क्या असर पड़ेगा?
जो व्यापारी अभी तक फुटपाथ, सड़कों के किनारे या अस्थायी बाजारों में मांस बेचते थे, उन्हें अब नगर निकाय से अनुमति लेनी होगी।
जिनके पास लाइसेंस नहीं है, उन्हें या तो नया लाइसेंस लेना होगा या निर्धारित बाजार/कसाईखानों में शिफ्ट होना पड़ेगा।
छोटे विक्रेताओं की चिंता है कि दुकान किराया, लाइसेंस फीस और नियमों का खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल होगा। कई लोगों की रोज़ी-रोटी इसी काम पर निर्भर है, इसलिए उन्हें डर है कि आमदनी कम हो सकती है।
सरकार ने यह कदम क्यों उठाया?
सरकार के मुताबिक कई शहरों से शिकायतें मिल रही थीं कि सड़कों के किनारे मांस बिक्री से गंदगी, बदबू और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याएँ पैदा हो रही हैं। कुछ जगहों पर स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बताए गए।
दरभंगा में इसे पहले परीक्षण के तौर पर लागू किया गया था, जिसके बाद इसे अन्य नगर क्षेत्रों में भी लागू करने का निर्णय लिया गया।
सरकार ने यह भी कहा कि यह फैसला किसी धर्म या समुदाय को ध्यान में रखकर नहीं लिया गया है, बल्कि सिर्फ शहरी प्रबंधन और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए है।
कानूनी आधार क्या है?
यह आदेश बिहार नगर निगम कानून, 2007 की संबंधित धाराओं के तहत लागू किया जा रहा है। इसके अनुसार बिना अनुमति कसाई, मछली या पोल्ट्री व्यापार नहीं किया जा सकता।
नगर निकायों को स्वच्छता, स्थान और संचालन से जुड़े नियम तय करने का अधिकार है। उल्लंघन करने पर जुर्माना, सामान जब्त या दुकान बंद भी कराई जा सकती है।
बिहार की अर्थव्यवस्था में मांस कारोबार
मांस और मछली का व्यापार राज्य की स्थानीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। हजारों परिवार इससे सीधे जुड़े हुए हैं —
पशुपालक
सप्लायर
ट्रांसपोर्टर
छोटे दुकानदार
इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि नियम लागू करते समय सरकार को रोजगार पर असर को भी ध्यान में रखना होगा।
अन्य राज्यों में भी ऐसे नियम
देश के कई राज्यों में पहले से ही खुले में मांस बिक्री पर नियम लागू हैं। कुछ जगह धार्मिक स्थलों के आसपास प्रतिबंध है, तो कहीं लाइसेंस और ढकी दुकानें अनिवार्य हैं।
लेकिन अक्सर समस्या नियम बनाने की नहीं, बल्कि उनके पालन की होती है।
स्वास्थ्य बनाम रोजगार – असली बहस
इस फैसले के बाद दो तरह की राय सामने आ रही है।
एक वर्ग इसे साफ-सफाई और स्वास्थ्य के लिए जरूरी कदम बता रहा है।
वहीं दूसरा वर्ग कहता है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था दिए अचानक नियम लागू करना छोटे व्यापारियों के लिए कठिन होगा।
सच यही है कि शहरों को स्वच्छ बनाना जरूरी है, लेकिन रोज़ कमाकर खाने वालों की आजीविका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर सरकार लाइसेंस प्रक्रिया आसान करे, सस्ती दुकानें उपलब्ध कराए और प्रशिक्षण दे, तो यह फैसला ज्यादा सफल हो सकता है।
आगे क्या?
आने वाले दिनों में असली चुनौती नियम लागू कराने की होगी।
नगर निकायों को निरीक्षण, लाइसेंस जारी करने और वैकल्पिक बाजार विकसित करने जैसे काम तेजी से करने होंगे।
यदि प्रशासन और व्यापारियों के बीच तालमेल बन गया, तो यह कदम शहरों की सफाई और व्यवस्था सुधारने में मददगार साबित हो सकता है।
बिहार सरकार का यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि शहरी जीवन शैली बदलने की कोशिश है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नियमों के साथ लोगों की आजीविका और व्यवहारिक समस्याओं को कितनी समझदारी से संभाला जाता है।

















