नई दिल्ली:
देश की औद्योगिक गतिविधियों में मार्च महीने के दौरान सुस्ती देखने को मिली है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की वृद्धि दर घटकर 4.1% रह गई, जो पिछले पांच महीनों का सबसे कम स्तर है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब वैश्विक परिस्थितियों, खासकर पश्चिम एशिया में जारी तनाव, का असर धीरे-धीरे भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है।
सरकारी आंकड़ों से यह भी संकेत मिलता है कि निर्माण (कंस्ट्रक्शन) और उपभोक्ता-आधारित क्षेत्रों में कमजोरी इस गिरावट की बड़ी वजह रही। इन सेक्टरों की धीमी रफ्तार ने कुल औद्योगिक वृद्धि को नीचे खींचा है।
पहले से ही धीमी हो रही थी रफ्तार
विशेषज्ञों के अनुसार, औद्योगिक उत्पादन में यह गिरावट अचानक नहीं आई है। जनवरी 2026 से ही इसमें नरमी के संकेत मिलने लगे थे, यानी पश्चिम एशिया संकट शुरू होने से पहले ही अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ रही थी। फरवरी के बाद हालात और ज्यादा प्रभावित हुए।
कोर सेक्टर में भी कमजोरी
इससे पहले जारी आंकड़ों में यह सामने आया था कि आठ प्रमुख उद्योग, जो IIP का लगभग 40% हिस्सा बनाते हैं, मार्च में 0.4% तक सिकुड़ गए। यह गिरावट संकेत देती है कि बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में भी दबाव बना हुआ है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर असर
औद्योगिक उत्पादन के सबसे बड़े हिस्से, यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि भी मार्च में घटकर करीब 4.3% रह गई, जो पिछले पांच महीनों का न्यूनतम स्तर है। हालांकि, यह पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले थोड़ा बेहतर है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसे संतोषजनक नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे माल की लागत बढ़ने और पेट्रोलियम व गैस की आपूर्ति में दबाव के कारण घरेलू उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसका सीधा असर फैक्ट्रियों के उत्पादन पर पड़ा है।
पूंजीगत वस्तुओं में मजबूती
हालांकि हर क्षेत्र में गिरावट नहीं देखी गई। पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) से जुड़े सेक्टर में मार्च के दौरान मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला। इस क्षेत्र में करीब 14.6% की वृद्धि दर्ज की गई, जो लगभग ढाई साल का उच्चतम स्तर है। यह संकेत देता है कि निवेश आधारित मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर में भी सुस्ती
इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण क्षेत्र की बात करें तो यहां भी वृद्धि दर घटकर लगभग 6.7% रह गई, जो नौ महीने का निचला स्तर है। इसके बावजूद अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह क्षेत्र अभी भी अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहा है।
उपभोक्ता मांग कमजोर
उपभोक्ता वस्तुओं, खासकर रोजमर्रा की चीजों (नॉन-ड्यूरेबल्स) में मांग सीमित रही। इस श्रेणी में केवल 1.1% की मामूली वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि, पिछले साल इसी समय इस क्षेत्र में गिरावट थी, इसलिए इस बार की वृद्धि को आधार प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है।
पूरे साल का प्रदर्शन
अगर पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें, तो औद्योगिक उत्पादन की औसत वृद्धि दर 4.1% रही। यह पिछले वित्त वर्ष के 4.07% से थोड़ा बेहतर है, लेकिन उम्मीद के मुताबिक तेज नहीं मानी जा रही।
आगे क्या संकेत मिलते हैं?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में वैश्विक परिस्थितियां और घरेलू मांग, दोनों ही औद्योगिक उत्पादन की दिशा तय करेंगे। निवेश आधारित सेक्टर में मजबूती एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन उपभोक्ता मांग में सुधार जरूरी है ताकि समग्र विकास दर तेज हो सके।
मार्च के आंकड़े यह साफ बताते हैं कि भारतीय औद्योगिक क्षेत्र इस समय संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। जहां एक ओर कुछ सेक्टर मजबूती दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मांग और लागत से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। आने वाले महीनों में स्थिति किस दिशा में जाती है, यह काफी हद तक वैश्विक और घरेलू आर्थिक माहौल पर निर्भर करेगा।
Reference The Hindu