भागलपुर।
बिहार में मत्स्य पालन और मोती उत्पादन को एक नई दिशा देने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने एक ऐसी योजना लागू करने का निर्णय लिया है, जिसमें पारंपरिक मछली पालन के साथ-साथ मोती उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य किसानों और मत्स्य पालकों की आमदनी में इजाफा करना है, साथ ही जैव विविधता को भी सहेजना है।
मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग द्वारा शुरू की गई इस नई पहल के तहत राज्य में देसी प्रजाति की मछलियों को प्राथमिकता दी जाएगी। योजना के माध्यम से विभिन्न जिलों में तालाबों में एक साथ कई प्रकार की मछलियां पाली जाएंगी, जिनमें झींगा, माइनर और मीडियम कार्प के साथ-साथ मोती उत्पादन भी शामिल रहेगा।
जानकारी के अनुसार, इस योजना के तहत 51 एकड़ में झींगा पालन और 50 एकड़ में मोती उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वहीं, 65 एकड़ क्षेत्र में माइनर और मीडियम कार्प मछलियों का पालन किया जाएगा, जबकि 62.50 एकड़ में कैटफिश पालन को बढ़ावा मिलेगा। राज्य स्तर पर कुल 239 टन मछली और 1.2 टन मोती उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और देसी प्रजातियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि बाजार में इनकी मांग भी पूरी हो सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि देसी मछलियों की मांग लगातार बढ़ रही है, खासकर माइनर कार्प समूह की मछलियां लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
योजना के तहत प्रत्येक यूनिट को लगभग 0.5 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाएगा। भागलपुर जिले को इस योजना में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। यहां मछली पालन के लिए 6 यूनिट, कैटफिश के लिए 5 यूनिट, झींगा के लिए 2 यूनिट और मोती उत्पादन के लिए 4 यूनिट स्थापित करने की मंजूरी दी गई है।
मछलियों के वर्गीकरण पर एक नजर:
. राज्य में विभिन्न प्रकार की मछलियों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर पालन को बढ़ावा दिया जाएगा।
. मेजर कार्प में रोहू, कतला और मृगल शामिल हैं।
. माइनर कार्प में फ्रिंज्ड लिप कार्प, कलबासु, कुरसी, बाटा, रेवां, दरही जैसी प्रजातियां आती हैं।
. कैटफिश समूह में मांगुर, सिंगी, टेंगरा, गरई, पंगास जैसी मछलियां प्रमुख हैं।
किसानों को मिलेगा सीधा लाभ:
इस योजना के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही, स्थानीय किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा। सरकार का फोकस इस बात पर है कि बीज उत्पादन भी राज्य के अंदर ही हो, ताकि बाहरी निर्भरता कम हो सके।
आर्थिक और सामाजिक असर:
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकती है। मोती उत्पादन जैसी नई गतिविधि जुड़ने से किसानों की आय के नए स्रोत खुलेंगे। इसके अलावा, देसी मछलियों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा, जो पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी है।
कुल मिलाकर, यह योजना बिहार के मत्स्य क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो आने वाले समय में राज्य न केवल मछली उत्पादन में बल्कि मोती उत्पादन में भी अपनी अलग पहचान बना सकता है।
Reference Hindustan