
नई दिल्ली: देश की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक अहम पहल के तहत, अब स्कूली पाठ्यक्रम में कानूनी अध्ययन (Legal Studies) को बेहतर और संतुलित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद, अनुभवी कानूनी विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जा रही है, जो एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने में सहयोग करेगी।
इस प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा और वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने अपनी सहमति जताई है कि वे इस विशेषज्ञ समूह का हिस्सा बनेंगे। यह समिति खासतौर पर कक्षा 8 और उससे ऊपर की कक्षाओं के लिए तैयार किए जाने वाले कानूनी विषयों के पाठ्यक्रम पर काम करेगी।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुआ फैसला
यह पूरा घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के आदेश के बाद सामने आया है। अदालत ने एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर खुद संज्ञान लेते हुए कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” से जुड़े अंश पर आपत्ति जताई थी।
कोर्ट का मानना था कि इस तरह की सामग्री बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति गलत धारणा पैदा कर सकती है। इसलिए इस विषय को गंभीरता से लेते हुए, अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विशेषज्ञों की एक टीम बनाकर इस पाठ्यक्रम की समीक्षा करे।
पाठ्यक्रम में बदलाव और सावधानी
इससे पहले केंद्र सरकार ने इस विवादित अध्याय की हजारों प्रतियां वितरण से वापस ले ली थीं, लेकिन अदालत ने केवल हटाने को पर्याप्त नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर इस अध्याय में बदलाव किया जाता है, तो उसे तभी प्रकाशित किया जाए जब विशेषज्ञ समिति से मंजूरी मिल जाए।
साथ ही अदालत ने एनसीईआरटी के उस दावे पर भी सवाल उठाए, जिसमें कहा गया था कि अध्याय को पहले ही संशोधित किया जा चुका है।
विशेषज्ञ समिति की भूमिका
नई गठित समिति में न्यायिक, शैक्षणिक और कानूनी क्षेत्र के अनुभवी लोग शामिल होंगे। इसके अलावा, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के सहयोग से इस पाठ्यक्रम को और बेहतर बनाने की योजना है। समिति का उद्देश्य सिर्फ कक्षा 8 ही नहीं, बल्कि अन्य कक्षाओं के लिए भी कानूनी शिक्षा को संतुलित और तथ्यात्मक बनाना है
मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना (नोट: संदर्भ अनुसार) ने इस पहल पर संतोष जताते हुए कहा कि इस कार्य के लिए इससे बेहतर विशेषज्ञ नहीं हो सकते। उनका मानना है कि सही दिशा में उठाया गया यह कदम छात्रों को निष्पक्ष और सटीक जानकारी देने में मदद करेगा।
मानवीय दृष्टिकोण (Human Touch)
शिक्षा सिर्फ जानकारी देने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह बच्चों के सोचने और समझने के तरीके को भी आकार देती है। ऐसे में पाठ्यक्रम में संतुलन और जिम्मेदारी बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मन में न्यायपालिका के प्रति सही और निष्पक्ष समझ भी विकसित करेगा।






