
कभी घर-आंगन और छतों पर चहचहाने वाली गौरैया आज धीरे-धीरे शहरों से गायब होती जा रही है। बदलते शहरी माहौल, आधुनिक निर्माण शैली और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण इस नन्हीं चिड़िया का जीवन मुश्किल होता जा रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब इसे बचाने के लिए जागरूकता और प्रयासों की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
क्यों कम हो रही है गौरैया?
विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने घरों में मिलने वाले छोटे-छोटे छेद और कोनों की जगह अब कंक्रीट के बंद ढांचे ने ले ली है। इससे गौरैया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिल रही। इसके अलावा कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग भी इनके भोजन स्रोत को प्रभावित कर रहा है। मोबाइल टावरों से निकलने वाले विकिरण को भी एक कारण माना जाता है, हालांकि इस पर शोध जारी है।
शहरों में तेजी से घटती संख्या
नगर क्षेत्रों में गौरैया की संख्या लगातार गिरती जा रही है। एक सर्वे के अनुसार, कई इलाकों में इनकी मौजूदगी बहुत कम रह गई है। पहले जहां सुबह-शाम इनकी आवाज आम थी, वहीं अब इन्हें देखना भी दुर्लभ होता जा रहा है।
संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदम
गौरैया को बचाने के लिए कई जगहों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। लोगों को घरों की बालकनी या छत पर पानी और दाना रखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही, कृत्रिम घोंसले लगाने की पहल भी की जा रही है ताकि इन्हें सुरक्षित ठिकाना मिल सके।
स्थानीय स्तर पर प्रयास
कुछ नगर निगम और सामाजिक संस्थाएं मिलकर इस दिशा में काम कर रही हैं। कई इलाकों में हजारों की संख्या में घोंसले लगाए गए हैं और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। इन प्रयासों से धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं।
हमारी छोटी-सी कोशिश, बड़ा बदलाव
गौरैया को बचाना केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति इसमें योगदान दे सकता है। अगर हम अपने घरों में थोड़ी-सी जगह, पानी और दाना उपलब्ध कराएं, तो यह नन्हीं चिड़िया फिर से हमारे आसपास चहक सकती है।
गौरैया का संरक्षण केवल एक पक्षी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम है। यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस प्यारी चिड़िया को केवल किताबों में ही देख पाएंगी।






