निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर कानून बनाने पर विचार करे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। देश में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) जैसे संवेदनशील विषय पर स्पष्ट कानून की जरूरत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अहम सुझाव दिया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर कानूनी अस्पष्टता और भावनात्मक परिस्थितियाँ होती हैं, इसलिए एक स्पष्ट और व्यवस्थित कानून बनने से मरीजों, उनके परिवारों और डॉक्टरों को निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब एक गंभीर रूप से बीमार युवक के मामले की सुनवाई की जा रही थी। अदालत ने कहा कि जीवन और मृत्यु से जुड़े मामलों में भावनात्मक और मानवीय पहलू बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मामलों के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा होना जरूरी है ताकि निर्णय लेते समय किसी तरह की भ्रम की स्थिति न रहे।

 

कोर्ट ने क्यों उठाया कानून बनाने का मुद्दा

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वर्तमान में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर कुछ न्यायिक दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन एक समर्पित कानून होने से प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट हो सकती है। इससे अस्पतालों, डॉक्टरों और मरीजों के परिवारों को कानूनी प्रक्रिया समझने और उसका पालन करने में आसानी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर परिवार कठिन भावनात्मक दौर से गुजरता है। इसलिए एक सुव्यवस्थित कानून होने से निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बन सकती है।

 

क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु

निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी ऐसे मरीज के जीवनरक्षक उपचार को रोक देना या हटाना, जो लंबे समय से गंभीर बीमारी या कोमा जैसी स्थिति में हो और जिसके ठीक होने की संभावना बहुत कम हो। इसमें मरीज को जानबूझकर मृत्यु देने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि कृत्रिम जीवन समर्थन प्रणाली को हटाया जाता है।

See also  केंद्र ने VB-G RAM G Act, 2025 के मसौदा नियम जारी किए, जनता से मांगे सुझाव

भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु यानी किसी दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देना अवैध माना जाता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति दे चुका है, लेकिन इसके लिए सख्त प्रक्रिया और चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी जरूरी होती है।

 

हरिश राणा का मामला बना चर्चा का केंद्र

इस मामले में हरियाणा के 32 वर्षीय हरिश राणा का जिक्र सामने आया, जो कभी पढ़ाई में बेहद होनहार छात्र थे। बताया जाता है कि वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे और पढ़ाई में टॉपर रहे थे।

करीब 13 साल पहले एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें गंभीर चोट लगी और उसके बाद से वह लंबे समय से बिस्तर पर हैं। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 100 प्रतिशत विकलांगता हो चुकी है और वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं।

 

परिवार का भावुक संघर्ष

हरिश राणा के माता-पिता पिछले कई वर्षों से उनकी देखभाल कर रहे हैं। परिवार के लिए यह समय बेहद कठिन रहा है, लेकिन उन्होंने बेटे का साथ कभी नहीं छोड़ा। कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान माता-पिता की समर्पित सेवा और त्याग की सराहना की।

परिवार का कहना है कि वे अपने बेटे की पीड़ा को समझते हैं और चाहते हैं कि उसके जीवन से जुड़े निर्णय संवेदनशीलता के साथ लिए जाएँ।

 

अंगदान की इच्छा भी जताई

हरिश राणा के माता-पिता ने अदालत में यह भी कहा कि यदि इच्छामृत्यु की अनुमति मिलती है और उनके बेटे के शरीर के कोई अंग उपयोगी हों, तो वे उन्हें जरूरतमंद मरीजों के लिए दान करना चाहते हैं। उनका मानना है कि इससे किसी और की जिंदगी बच सकती है और यह एक सकारात्मक कदम होगा।

See also  तकनीकी हब बनने की ओर बिहार, बेंगलुरु मॉडल पर इलेक्ट्रॉनिक सिटी की तैयारी

 

मरने के अधिकार” पर फिर चर्चा

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक और अभिनेता विलियम शेक्सपियर के नाटक हैमलेट की प्रसिद्ध पंक्ति “To be or not to be” का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि जीवन और मृत्यु से जुड़े प्रश्न सदियों से मानव समाज में विचार का विषय रहे हैं।

कोर्ट का कहना था कि ऐसे जटिल और संवेदनशील मुद्दों पर समाज, कानून और चिकित्सा व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।

 

आगे क्या हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद संभावना है कि केंद्र सरकार इस विषय पर विस्तृत चर्चा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मुद्दे पर स्पष्ट कानून बनता है तो इससे भविष्य में ऐसे मामलों में निर्णय लेना अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी हो सकेगा।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर बहस सिर्फ कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक पहलुओं से भी जुड़ी है। इसलिए इस विषय पर किसी भी निर्णय से पहले व्यापक विचार-विमर्श जरूरी माना जा रहा है।

Related Posts

खान सर फायरिंग मामले में पुलिस की कार्रवाई, कोचिंग संस्थानों की प्रतिस्पर्धा पर सरकार सख्त

पटना। बिहार की राजधानी पटना में चर्चित शिक्षाविद और यूट्यूबर फैसल खान, जिन्हें छात्र समुदाय में “खान सर” के नाम से जाना जाता है, हाल ही में हुए फायरिंग और…

Read more

महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात चिंता का विषय, सुधार के बावजूद राष्ट्रीय औसत से पीछे

मुंबई। महाराष्ट्र में स्वास्थ्य सेवाओं और मातृ-शिशु देखभाल के क्षेत्र में प्रगति दर्ज की गई है, लेकिन जन्म के समय लड़कियों और लड़कों के अनुपात को लेकर राज्य की स्थिति…

Read more

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

खान सर फायरिंग मामले में पुलिस की कार्रवाई, कोचिंग संस्थानों की प्रतिस्पर्धा पर सरकार सख्त

खान सर फायरिंग मामले में पुलिस की कार्रवाई, कोचिंग संस्थानों की प्रतिस्पर्धा पर सरकार सख्त

महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात चिंता का विषय, सुधार के बावजूद राष्ट्रीय औसत से पीछे

महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात चिंता का विषय, सुधार के बावजूद राष्ट्रीय औसत से पीछे

वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7% GDP वृद्धि का अनुमान, भारतीय अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूत रफ्तार

वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7% GDP वृद्धि का अनुमान, भारतीय अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूत रफ्तार

विश्व पर्यावरण दिवस 2026: प्रकृति को बचाने का संकल्प लेने का दिन

विश्व पर्यावरण दिवस 2026: प्रकृति को बचाने का संकल्प लेने का दिन

मुजफ्फरपुर के निजी अस्पताल में भीषण आग, ICU में भर्ती 5 मरीजों की मौत, कई घायल

मुजफ्फरपुर के निजी अस्पताल में भीषण आग, ICU में भर्ती 5 मरीजों की मौत, कई घायल

मारुति सुजुकी ने पेश की भारत की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार, एथेनॉल आधारित तकनीक से मिलेगी नई दिशा

मारुति सुजुकी ने पेश की भारत की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार, एथेनॉल आधारित तकनीक से मिलेगी नई दिशा