भारत की सदियों पुरानी कला-धरोहर अब धीरे-धीरे अपने घर लौट रही है। लंबे समय पहले चोरी या अवैध तरीके से विदेश पहुँचाई गई प्राचीन कांस्य मूर्तियाँ अब अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कारण भारत को वापस मिल रही हैं। हाल ही में एक बड़े विदेशी संग्रहालय ने कई भारतीय मूर्तियाँ लौटाने का निर्णय लिया, जिसे सांस्कृतिक न्याय की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं ये मूर्तियाँ?
ये प्रतिमाएँ केवल धातु की वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि भारतीय सभ्यता, धार्मिक आस्था और शिल्पकला की पहचान हैं। अधिकांश मूर्तियाँ दक्षिण भारत के मंदिरों से जुड़ी थीं और चोल काल की उत्कृष्ट कला शैली का उदाहरण मानी जाती हैं।
इन मूर्तियों में शिव, पार्वती और अन्य देवी-देवताओं के अद्भुत स्वरूप दिखाई देते हैं, जिन्हें उस समय मंदिरों में पूजा और उत्सवों के दौरान निकाला जाता था।
विदेश कैसे पहुँचीं?
कई दशक पहले मंदिरों से चोरी, अवैध खुदाई और तस्करी के माध्यम से ये कलाकृतियाँ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेची गईं। बाद में इन्हें संग्रहालयों और निजी संग्रहकर्ताओं ने खरीद लिया। उस समय इनकी असली उत्पत्ति का ठीक रिकॉर्ड नहीं रखा गया था, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि ये वस्तुएँ भारत से चोरी हुई थीं।
वापसी कैसे संभव हुई?
हाल के वर्षों में भारत सरकार, पुरातत्व विभाग और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों ने मिलकर पुराने दस्तावेज़, तस्वीरें और मंदिर रिकॉर्ड खंगाले। प्रमाण मिलने के बाद विदेशी संस्थानों से बातचीत शुरू हुई।
अब कई संग्रहालय स्वेच्छा से वस्तुएँ लौटा रहे हैं क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि ये कलाकृतियाँ धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भारत की हैं।
भारत के लिए इसका मतलब
. खोई हुई सांस्कृतिक पहचान वापस मिल रही है
. मंदिरों और स्थानीय समुदायों को भावनात्मक संतोष
. तस्करी रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून मजबूत
. दुनिया में भारत की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा बढ़ी
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह शुरुआत है। दुनिया भर के संग्रहालयों में अभी भी अनेक भारतीय कलाकृतियाँ मौजूद हैं। जांच जारी है और आने वाले वर्षों में और भी धरोहरें वापस लौट सकती हैं।
प्राचीन मूर्तियों की वापसी केवल वस्तुओं की वापसी नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और पहचान की वापसी है। यह दिखाता है कि सांस्कृतिक विरासत किसी देश की आत्मा होती है — और अंततः उसे अपने मूल स्थान पर ही होना चाहिए।
















