
नई दिल्ली: राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि केंद्र सरकार की सलाह (एडवाइजरी) को किसी पर जबरन लागू करने के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि यह निर्देश केवल एक प्रोटोकॉल बताता है, न कि नागरिकों पर कोई कानूनी बाध्यता थोपता है।
दरअसल, यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें दावा किया गया था कि गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्देश लोगों पर वंदे मातरम् गाने का दबाव बनाता है। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति इसे नहीं गाता है, तो उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
क्या है सरकार की एडवाइजरी?
सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देश में सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के उपयोग और उसके समय-स्थान से जुड़ी प्रक्रिया बताई गई है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह केवल एक मार्गदर्शन है, इसे कानून की तरह लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि किसी व्यक्ति को इस एडवाइजरी के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो वह सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। कोर्ट ने यह भी माना कि लोगों की आशंकाएं स्पष्ट नहीं हैं और उन्हें ठोस आधार पर पेश करना जरूरी है।
राष्ट्रीय गीत बनाम राष्ट्रगान
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान दोनों अलग-अलग पहचान रखते हैं। अदालत ने कहा कि संविधान में राष्ट्रगान के सम्मान को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं, जबकि वंदे मातरम् के संदर्भ में ऐसा कोई बाध्यकारी नियम नहीं है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर
सॉलिसिटर जनरल की ओर से यह दलील दी गई कि देशभक्ति एक स्वाभाविक भावना है, जिसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता। अदालत ने इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार है।
स्कूलों को लेकर क्या निर्देश हैं?
सरकार की एडवाइजरी में यह भी कहा गया है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत वंदे मातरम् के साथ की जा सकती है। लेकिन “किया जा सकता है” का मतलब यह नहीं है कि यह अनिवार्य है। छात्रों और शिक्षकों को इसमें भाग लेने या न लेने की स्वतंत्रता है।
याचिका पर क्या हुआ फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस याचिका पर अंतिम निर्णय देने से इनकार करते हुए इसे “समय से पहले” बताया। अदालत ने संकेत दिया कि जब तक किसी ठोस नुकसान या भेदभाव का मामला सामने नहीं आता, तब तक इस तरह की आशंकाओं पर हस्तक्षेप जरूरी नहीं है।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है—देशभक्ति और सम्मान जैसे भाव दिल से आते हैं, इन्हें कानून के जरिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वंदे मातरम् का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन इसे गाने या न गाने का फैसला हर नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।





