
आगरा :
लंबे समय से यह धारणा रही है कि बांझपन की समस्या मुख्य रूप से महिलाओं से जुड़ी होती है, लेकिन अब एक ताज़ा अध्ययन ने इस सोच को चुनौती दी है। देश के 17 प्रमुख चिकित्सा संस्थानों द्वारा किए गए व्यापक शोध में सामने आया है कि हर चौथे मामले में पुरुष भी बराबर जिम्मेदार हैं।
दो साल तक चला विस्तृत अध्ययन
यह अध्ययन जुलाई 2023 से जून 2025 के बीच किया गया, जिसमें 2414 दंपतियों को शामिल किया गया। शोध के निष्कर्ष मार्च 2026 में प्रकाशित किए गए। अध्ययन के अनुसार:
लगभग 27.3% मामलों में पुरुष कारण बने
36.9% मामलों में महिलाएं जिम्मेदार रहीं
करीब 9.7% मामलों में दोनों की भूमिका पाई गई
वहीं 26% मामलों में कारण स्पष्ट नहीं हो पाया
इससे साफ है कि समस्या को सिर्फ महिलाओं से जोड़ना एकतरफा सोच है।
वैश्विक स्तर पर भी बढ़ रही समस्या
विश्व स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। अनुमान है कि हर 6 में से 1 व्यक्ति अपने जीवनकाल में बांझपन की समस्या का सामना करता है। भारत में ही करीब 2.7 करोड़ दंपति इस समस्या से प्रभावित हैं।
पुरुषों में प्रमुख कारण क्या हैं?
शोध में पुरुषों में बांझपन के पीछे कई कारण सामने आए:
स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या में कमी
स्पर्म की गति धीमी होना
नसों में सूजन (वेरिकोसील जैसी समस्या)
जीवनशैली से जुड़े कारण
इनमें से सबसे बड़ा हिस्सा स्पर्म से जुड़ी समस्याओं का रहा।
जीवनशैली का गहरा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि आज की बदलती जीवनशैली भी इस समस्या को बढ़ा रही है। अध्ययन में सामने आए कुछ प्रमुख कारण:
शराब का सेवन – 23.9%
तंबाकू उपयोग – 17.3%
धूम्रपान – 12.9%
अधिक स्क्रीन टाइम – 9%
हीट एक्सपोजर (ज्यादा गर्मी) – 6.2%
कुछ दवाइयों और केमिकल्स का असर
स्पर्म से जुड़ी समस्याएं सबसे बड़ी वजह
अध्ययन में यह भी पाया गया कि:
23.4% पुरुषों में स्पर्म की गति कम थी
15% में स्पर्म बन ही नहीं रहे थे
19.8% में स्पर्म की संख्या कम थी
8.1% में तीनों समस्याएं एक साथ थीं
सोच बदलने की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि बांझपन को लेकर समाज की सोच बदली जाए। यह सिर्फ महिलाओं की समस्या नहीं है, बल्कि पुरुषों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
क्या करें दंपति?
समय पर जांच कराएं
स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं
तनाव कम रखें
डॉक्टर की सलाह से इलाज शुरू करें
यह अध्ययन एक अहम संदेश देता है—बांझपन एक साझा समस्या है, न कि किसी एक का दोष। सही जानकारी, समय पर जांच और बेहतर जीवनशैली से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।






