आस्था बनाम कानून: प्रयागराज अदालत ने दिए सख्त निर्देश

प्रयागराज | न्यायपालिका ने एक संवेदनशील मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस को तुरंत कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। प्रयागराज की विशेष POCSO अदालत ने एक धार्मिक संस्था से जुड़े स्वामी और अन्य लोगों के खिलाफ नाबालिग शिष्यों के साथ कथित यौन शोषण के आरोपों पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।

 

अदालत ने क्यों दिया आदेश

मामला तब अदालत पहुंचा जब शिकायतकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने पहले पुलिस और अधिकारियों के सामने शिकायत की थी, लेकिन कोई केस दर्ज नहीं किया गया। इसके बाद पीड़ित पक्ष ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

विशेष न्यायाधीश (POCSO) ने शिकायत और प्रस्तुत दस्तावेजों की समीक्षा के बाद झूंसी थाना प्रभारी को तुरंत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू करने के निर्देश दिए।

 

किन धाराओं में होगी जांच

अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कानून और भारतीय न्याय संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत की जाएगी।

साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच निष्पक्ष, तेज और स्वतंत्र तरीके से होनी चाहिए तथा पीड़ित बच्चों की पहचान और गरिमा पूरी तरह सुरक्षित रखी जाए।

 

पहले भी विवादों में रहा मामला

बताया जा रहा है कि आरोपी धार्मिक प्रमुख पिछले महीने भी सुर्खियों में आए थे, जब मेला क्षेत्र में उनके कुछ आचरण को लेकर प्रशासन ने नोटिस जारी किया था। उसी पृष्ठभूमि में अब यह नया मामला सामने आने से स्थिति और गंभीर हो गई है।

 

जांच रिपोर्ट पर अदालत की टिप्पणी

अदालत के समक्ष पुलिस आयुक्त द्वारा पेश प्रारंभिक जांच रिपोर्ट में घटना को गंभीर बताया गया। न्यायालय ने माना कि आरोप सामान्य नहीं हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता, इसलिए नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर विस्तृत जांच आवश्यक है।

 

पीड़ितों की सुरक्षा पर जोर

कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष तौर पर कहा कि जांच के दौरान बच्चों के अधिकारों की रक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए।

. पहचान गोपनीय रखी जाए

. मानसिक दबाव न बनाया जाए

. बयान संवेदनशील वातावरण में लिया जाए

 

आगे क्या होगा

एफआईआर दर्ज होने के बाद अब पुलिस साक्ष्य, गवाहों के बयान और मेडिकल-कानूनी पहलुओं के आधार पर पूरी पड़ताल करेगी। जांच पूरी होने पर अदालत में चार्जशीट दाखिल की जाएगी, जिसके बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू होगी।

 

यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह संदेश देता है कि नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में देरी या लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि बच्चों से जुड़े अपराधों पर कानून बेहद सख्त है और किसी भी व्यक्ति की सामाजिक या धार्मिक पहचान न्याय प्रक्रिया में बाधा नहीं बन सकती।

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