
नई दिल्ली:
भारत में एक ऑस्कर-नामांकित अंतरराष्ट्रीय फिल्म को लेकरविवाद गहराता जा रहा है। फिल्म “द वॉयस ऑफ हिंद रजाब” (The Voice of Hind Rajab), जो गाजा संघर्ष से जुड़ी एक संवेदनशील कहानी प्रस्तुत करती है, को भारत में रिलीज़ के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा कथित तौर पर मंजूरी नहीं दी गई है। फिल्म के भारतीय वितरक मनोज नंदवाना ने यह जानकारी दी।
फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि
यह फिल्म एक पांच वर्षीय फिलिस्तीनी बच्ची की दुखद कहानी पर आधारित है, जिसकी मौत 2024 में गाजा में हुए संघर्ष के दौरान बताई जाती है। फिल्म ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और ऑस्कर नामांकन भी हासिल किया, जिससे इसकी चर्चा और बढ़ गई।
CBFC की प्रतिक्रिया पर सवाल
वितरक के अनुसार, फिल्म को औपचारिक रूप से लिखित अस्वीकृति नहीं दी गई, बल्कि मौखिक रूप से ही इसे रोक दिया गया। उनका कहना है कि उन्हें पहले से अंदेशा था कि फिल्म को प्रमाणन नहीं मिलेगा, क्योंकि पिछले कुछ समय में कई फिल्मों को इसी तरह के कारणों से मंजूरी नहीं दी गई है।
उन्होंने यह भी बताया कि अतीत में उन्होंने एक अन्य फिल्म “लैंड जिहाद” भी प्रस्तुत की थी, जिसे सांप्रदायिक तनाव की आशंका के कारण लिखित रूप से खारिज कर दिया गया था।
मंत्रालय और बोर्ड की चुप्पी
इस पूरे मामले पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और CBFC की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, फिल्म को अब CBFC की पुनरीक्षण समिति (Revising Committee) के पास भेजा गया है, जहां इसका दोबारा मूल्यांकन किया जाएगा।
फिल्म फेस्टिवल्स में भी अड़चन
यह फिल्म कई प्रमुख फिल्म समारोहों में भी प्रदर्शित नहीं हो सकी। इनमें बेंगलुरु इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और गोवा में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया शामिल हैं। भारत में इसे केवल कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन किया गया।
अधिकार और निवेश
मनोज नंदवाना ने इस फिल्म के भारत में वितरण अधिकार काफी पहले ही खरीद लिए थे, जब यह ऑस्कर की दौड़ में शामिल नहीं हुई थी। उन्होंने इसके लिए लगभग ₹1 करोड़ का निवेश किया था।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी फिल्म को इस तरह रोकना “शर्मनाक” है। उनका मानना है कि फिल्म दिखाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है और इसे सरकार-सरकार के संबंधों से जोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
बढ़ती चिंता
पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक या सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों को लेकर सेंसरशिप की घटनाएं बढ़ी हैं। इस मामले ने एक बार फिर फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी, सेंसरशिप और कला के अधिकार जैसे बड़े मुद्दों को सामने लाता है। अब सभी की नजरें CBFC की पुनरीक्षण समिति के फैसले पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि यह फिल्म भारतीय दर्शकों तक पहुंचेगी या नहीं।






