नई दिल्ली |
देश की चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता के अधिकारों को मज़बूत करने को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान “नोटा” (None of the Above) से जुड़े मुद्दे पर अहम टिप्पणियाँ सामने आईं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता को वास्तविक और असरदार विकल्प भी मिलना चाहिए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अगर किसी क्षेत्र में अधिकांश मतदाता नोटा का चयन करते हैं, तो इसका मतलब है कि जनता उपलब्ध उम्मीदवारों से संतुष्ट नहीं है। ऐसे में चुनाव परिणाम को वैध मानना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस तर्क पर गंभीरता दिखाई और कहा कि नोटा का उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि मतदाता की असहमति को दर्ज करना भी है।
नोटा क्यों बना अहम मुद्दा
भारत में नोटा विकल्प लागू होने के बाद से मतदाताओं को यह अधिकार मिला कि वे किसी भी उम्मीदवार को पसंद न होने पर भी मतदान कर सकें। इससे मतदान प्रतिशत में भी वृद्धि देखी गई क्योंकि कई लोग अब बिना किसी दबाव के अपनी राय दर्ज कर रहे हैं।
हालांकि वर्तमान नियमों के अनुसार, चाहे नोटा को कितने भी वोट मिलें, सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी घोषित होता है। इसी व्यवस्था को चुनौती दी गई है।
याचिका में कहा गया कि यदि नोटा को सर्वाधिक वोट मिलते हैं, तो उस निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए और पहले वाले उम्मीदवारों को दोबारा मौका न दिया जाए। इससे राजनीतिक दल बेहतर और साफ छवि वाले प्रत्याशी उतारने के लिए बाध्य होंगे।
अदालत की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग से भी सवाल किए कि जब नोटा का विकल्प दिया गया है तो उसका वास्तविक प्रभाव क्या है। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में मतदाता केवल “चुनने” का ही नहीं, बल्कि “अस्वीकार करने” का भी अधिकार रखता है।
न्यायालय ने यह भी माना कि नोटा मतों की बढ़ती संख्या जनता के असंतोष का संकेत हो सकती है। इसलिए इस विकल्प को सिर्फ औपचारिकता बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने मामले की विस्तृत सुनवाई जारी रखने की बात कही।
लोकतंत्र पर संभावित असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नोटा को प्रभावी बना दिया जाता है, तो राजनीति की दिशा बदल सकती है।
राजनीतिक दलों को साफ छवि और योग्य उम्मीदवार देने पड़ेंगे
अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या कम हो सकती है
मतदाताओं का विश्वास चुनाव प्रक्रिया में बढ़ेगा
ग्रामीण इलाकों में भी अब मतदाता अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं। कई जगहों पर पंचायत चुनावों में नोटा को बड़ी संख्या में वोट मिल चुके हैं, जो जनता के संदेश को स्पष्ट दर्शाता है।
आम लोगों की राय
दिल्ली के एक कॉलेज छात्र ने कहा कि पहले लोग वोट डालने नहीं जाते थे क्योंकि उन्हें कोई उम्मीदवार पसंद नहीं होता था, लेकिन अब नोटा से उन्हें अपनी असहमति दर्ज करने का तरीका मिला है।
वहीं एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि अगर नोटा को प्रभावी बना दिया गया तो राजनीति में जवाबदेही बढ़ेगी और जनता की आवाज़ सच में सुनी जाएगी।
आगे क्या
अभी अदालत ने अंतिम फैसला नहीं दिया है, लेकिन इस मामले ने पूरे देश में चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले समय में यह तय होगा कि नोटा केवल एक विकल्प रहेगा या लोकतंत्र को नई दिशा देने वाला शक्तिशाली अधिकार बनेगा।
लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता होता है, और यह मामला उसी ताकत को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

















