
ऑनलाइन शादी के लिए बनाई गई वेबसाइटों पर बढ़ती धोखाधड़ी ने अब कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में एक चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि यदि कोई यूज़र दूसरे को ठगता है, तो उसमें प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी कितनी बनती है।
मामला क्या है?
हैदराबाद की एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि उसकी मुलाकात एक व्यक्ति से ऑनलाइन शादी की वेबसाइट के ज़रिये हुई। आरोपी ने खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बताया और भरोसा जीतने के बाद अलग-अलग बहानों से उससे बड़ी रकम ट्रांसफर करवा ली। बाद में न तो शादी हुई और न ही पैसा वापस मिला। जब महिला ने दबाव बनाया तो उसे धमकियां भी दी गईं।
प्लेटफॉर्म कैसे आया जांच के दायरे में?
जांच के दौरान पुलिस ने सिर्फ आरोपी तक ही सीमित न रहते हुए मैट्रिमोनियल वेबसाइट की भूमिका पर भी सवाल उठाए। यह तर्क दिया गया कि अगर यूज़र वेरिफिकेशन और सुरक्षा प्रक्रिया मजबूत होती, तो शायद यह ठगी रोकी जा सकती थी। इसी आधार पर वेबसाइट के संस्थापक अनुपम मित्तल का नाम भी केस में सामने आया।
कानून क्या कहता है?
कानूनी रूप से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म “इंटरमीडियरी” माने जाते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 79 के तहत, अगर प्लेटफॉर्म ने उचित सावधानी बरती हो और वह खुद ठगी में शामिल न हो, तो उसे आमतौर पर कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसी दलील के आधार पर बचाव पक्ष ने कहा कि वेबसाइट केवल लोगों को जोड़ने का माध्यम है, ठगी करने वाला व्यक्ति खुद जिम्मेदार है।
अदालत का रुख
तेलंगाना हाईकोर्ट के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। शीर्ष अदालत ने तत्काल गिरफ्तारी से राहत देते हुए यह अहम सवाल उठाया कि क्या बिना ठोस सबूत के किसी प्लेटफॉर्म को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह के मामलों में संतुलन जरूरी है—ताकि न तो अपराधी बचें और न ही नियमों का पालन करने वाले प्लेटफॉर्म बेवजह फंसें।
क्यों है यह मामला अहम?
यह केस सिर्फ एक ठगी की कहानी नहीं है, बल्कि डिजिटल इंडिया के दौर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। आने वाले समय में यह फैसला तय कर सकता है कि मैट्रिमोनियल और अन्य सोशल प्लेटफॉर्म्स को अपनी वेरिफिकेशन और सेफ्टी पॉलिसी कितनी सख्त करनी होगी।






