भारत की न्याय व्यवस्था एक बड़े मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि देश की विशाल आबादी के मुकाबले अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बेहद कम है। इसका सीधा असर मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने के रूप में सामने आ रहा है।
जजों की कमी क्यों बन रही बड़ी चुनौती?
देश में प्रति 10 लाख नागरिकों पर लगभग 22 न्यायाधीश ही कार्यरत हैं। जबकि कानून विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय की समय पर उपलब्धता के लिए यह संख्या कम से कम 50 जज प्रति 10 लाख आबादी के आसपास होनी चाहिए।
कम जज होने का परिणाम यह है कि अदालतों में मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और लोगों को फैसले के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है।
लंबित मामलों का बढ़ता पहाड़
. देशभर की अदालतों में करोड़ों केस लंबित हैं
. निचली अदालतों पर सबसे ज्यादा दबाव
. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी हजारों मामले विचाराधीन
. कई मामलों में पीढ़ियां गुजर जाती हैं लेकिन फैसला नहीं आता
यह स्थिति आम नागरिक के लिए न्याय की राह को कठिन बना देती है।
राज्यों की स्थिति भी अलग-अलग
रिपोर्ट के अनुसार अलग-अलग राज्यों में जजों की उपलब्धता में काफी अंतर है। कुछ राज्यों में न्यायाधीशों का अनुपात अपेाकृत बेहतर है, जबकि कई बड़े और जनसंख्या-बहुल राज्यों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
इसी वजह से कुछ क्षेत्रों में मामलों के निपटारे की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है।
देरी से न्याय = न्याय से वंचित
कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं —
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर है।”
जब किसी केस का फैसला 10-15 साल बाद आता है तो पीड़ित व्यक्ति को वास्तविक राहत नहीं मिल पाती। आर्थिक, मानसिक और सामाजिक नुकसान अलग होता है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
. अदालतों में नए जजों की नियुक्ति तेज की जाए
. खाली पदों को जल्द भरा जाए
. डिजिटल कोर्ट और ई-फाइलिंग व्यवस्था मजबूत हो
. वैकल्पिक विवाद निपटान (मध्यस्थता/लोक अदालत) को बढ़ावा मिले
भारत तेजी से बढ़ती आबादी वाला देश है, लेकिन उसी गति से न्यायिक ढांचा मजबूत नहीं हो पाया। यदि जजों की संख्या नहीं बढ़ाई गई तो अदालतों में लंबित मामलों का बोझ और बढ़ेगा। समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका को संसाधन, तकनीक और मानवबल—तीनों की तत्काल जरूरत है।
यह मुद्दा केवल अदालतों का नहीं, बल्कि आम नागरिक के अधिकारों और भरोसे से भी जुड़ा हुआ है।

















