कल्पना कीजिए उस दंपती की, जिन्होंने विवाह के पंद्रह वर्षों बाद संतान की उम्मीद बांधी थी। अस्पताल में बच्चे के जन्म की खुशी अभी पूरी तरह महसूस भी नहीं हो पाई थी कि कुछ ही घंटों में वह खुशी मातम में बदल गई। नवजात की सांसें थम चुकी थीं। वजह थी अस्पताल के भीतर फैला एक अदृश्य दुश्मन—एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर), जिसने बच्चे के रक्त को संक्रमित कर दिया।
यह कोई एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के अस्पतालों की भयावह सच्चाई है। देश में हर साल हजारों नवजात अस्पतालों में जन्म लेने के कुछ ही समय बाद दम तोड़ देते हैं। इलाज की जगह बने ये अस्पताल कई बार संक्रमण के सबसे बड़े केंद्र साबित हो रहे हैं।
जब अस्पताल खुद बीमारी फैलाने लगें
अस्पतालों को सुरक्षित और स्वच्छ होना चाहिए, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। कई सरकारी अस्पतालों में गंदे वार्ड, संक्रमित बेड, बदबूदार शौचालय, अस्वच्छ लेबर रूम और खुले में पड़ा बायोमेडिकल कचरा आम दृश्य बन चुका है। कहीं उपकरणों की ठीक से सफाई नहीं होती, तो कहीं हाथ धोने जैसी बुनियादी व्यवस्था भी नदारद रहती है।
ऐसे माहौल में खतरनाक बैक्टीरिया पनपते हैं। ये बैक्टीरिया धीरे-धीरे आम एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं। यही स्थिति एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस को जन्म देती है, जो आज भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है।
बुनियादी स्वच्छता की चौंकाने वाली तस्वीर
स्वास्थ्य से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि देश की बड़ी संख्या में स्वास्थ्य केंद्रों में हाथ धोने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कई लेबर रूम में कार्यशील शौचालय मौजूद नहीं हैं। पानी की उपलब्धता के बावजूद सेनिटेशन और हाइजीन सुविधाएं बेहद सीमित हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब स्वास्थ्यकर्मी ही स्वच्छता के न्यूनतम मानकों का पालन नहीं कर पाते, तो संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
अस्पतालों के भीतर फैलता एएमआर
भारत में लगभग 70 हजार अस्पताल हैं, जिनमें सरकारी और निजी दोनों शामिल हैं। रोज़ाना करोड़ों मरीज इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं। बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ इतनी अधिक होती है कि स्वच्छता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी भीड़ में संक्रमण तेजी से फैलता है।
चिकित्सा अनुसंधानों से पता चलता है कि आईसीयू जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में संक्रमण की दर बेहद चिंताजनक है। कई अस्पतालों में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो एक साथ कई दवाओं पर असर नहीं दिखाते। यह स्थिति मरीजों की जान के लिए सीधा खतरा बन जाती है।
नवजात क्यों हैं सबसे आसान शिकार
नवजात शिशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर होती है। अस्पतालों में फैले एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया उन्हें सबसे पहले निशाना बनाते हैं। यही कारण है कि नवजात सेप्सिस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।
इलाज महंगा, जोखिम ज्यादा
एएमआर से संक्रमित मरीजों का इलाज सामान्य मरीजों की तुलना में दो से तीन गुना महंगा हो जाता है। मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है और महंगी दवाओं का सहारा लेना पड़ता है। इसके बावजूद जान बचने की कोई गारंटी नहीं होती।
समाधान मौजूद, लेकिन अमल कमजोर
सरकार ने एएमआर से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली लड़ाई अस्पतालों के भीतर लड़ी जानी है। हाथ धोने की आदत, उपकरणों का सही स्टरलाइजेशन, बायोमेडिकल कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण और एंटीबायोटिक दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग—यही इस खतरे से निपटने के सबसे मजबूत हथियार हैं।
जब तक अस्पताल खुद स्वच्छ और सुरक्षित नहीं बनेंगे, तब तक मरीजों की जान जोखिम में रहेगी। एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी पड़ सकता है।

















