पटना:
आज जिस मैट्रिक परीक्षा में हर साल लाखों विद्यार्थी शामिल होते हैं, उसकी शुरुआत बेहद छोटे स्तर से हुई थी। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति (बिहार बोर्ड) ने अपनी पहली मैट्रिक परीक्षा वर्ष 1952-53 में आयोजित कराई थी। उस समय पूरे राज्य से केवल करीब 400 छात्र-छात्राओं ने परीक्षा दी थी, जबकि आज यह संख्या बढ़कर लगभग 15 लाख के आसपास पहुँच चुकी है।
स्थापना और शुरुआती दौर
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक माध्यमिक स्तर की परीक्षाएँ विश्वविद्यालयों के अधीन आयोजित होती थीं। बाद में राज्य सरकार ने अलग बोर्ड बनाने का निर्णय लिया और 1952 में कानून लागू कर बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का गठन किया गया। इसके बाद अगले ही साल पहली बार अलग से मैट्रिक परीक्षा कराई गई।
शुरुआती वर्षों में परीक्षा केंद्र कम थे, व्यवस्थाएँ सीमित थीं और कॉपियों का मूल्यांकन भी काफी समय लेता था।
समय के साथ बड़ा बदलाव
अब परीक्षा प्रणाली पूरी तरह बदल चुकी है। बोर्ड ने कई आधुनिक व्यवस्थाएँ लागू की हैं —
. ऑनलाइन फॉर्म भरना
. बारकोड लगी उत्तर पुस्तिकाएँ
. OMR शीट का उपयोग
. सीसीटीवी निगरानी
. अलग-अलग मूल्यांकन केंद्र
. कंप्यूटराइज्ड रिजल्ट प्रक्रिया
इन सुधारों की वजह से परिणाम पहले की तुलना में जल्दी जारी होने लगे हैं और गड़बड़ी की संभावना कम हुई है।
नकल रोकने के लिए कड़े कदम
कुछ वर्षों पहले परीक्षा में अनुचित साधनों के मामले सामने आए थे, जिसके बाद प्रशासन ने सुरक्षा और निगरानी सख्त कर दी। अब परीक्षा केंद्रों पर पुलिस बल, वीडियोग्राफी और निरीक्षण दल तैनात किए जाते हैं। प्रश्नपत्र के कई सेट और सख्त नियमों से पारदर्शिता बढ़ाई गई है।
आज की स्थिति
आज बिहार बोर्ड देश के सबसे बड़े परीक्षा बोर्डों में गिना जाता है। जिस परीक्षा में कभी कुछ सौ विद्यार्थी बैठते थे, वही परीक्षा अब पूरे राज्य के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य का आधार बन चुकी है।
करीब सात दशक में बिहार बोर्ड ने साधारण शुरुआत से आधुनिक परीक्षा प्रणाली तक लंबा सफर तय किया है। बढ़ती संख्या और तकनीकी सुधार यह दिखाते हैं कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था निरंतर विस्तार और परिवर्तन के दौर से गुजर रही

















