भारत ने फाउंडेशनल एआई मॉडल पेश कर तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ाया बड़ा कदम

नई दिल्ली:  भारत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में अहम उपलब्धि हासिल करते हुए अपना पहला फाउंडेशनल एआई मॉडल प्रस्तुत किया है। विशेषज्ञ इसे देश के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव मान रहे हैं, क्योंकि इससे भारत उभरती डिजिटल तकनीकों में वैश्विक स्तर पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है।

 

फाउंडेशनल एआई मॉडल क्या होता है

फाउंडेशनल एआई मॉडल वह मूल तकनीक होती है, जिस पर चैटबॉट, वॉइस असिस्टेंट, इमेज-जनरेशन ऐप और सरकारी एआई सिस्टम जैसे कई आधुनिक डिजिटल उपकरण बनाए जाते हैं।

इन मॉडलों को विशाल मात्रा में डेटा पर प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे वे भाषा, तस्वीर और अन्य सूचनाओं को समझने और जवाब देने में सक्षम बनते हैं। आज अधिकांश आधुनिक एआई एप्लिकेशन इसी आधार तकनीक पर काम करते हैं।

 

स्वदेशी एआई विकास की दिशा में कदम

बेंगलुरु की एक एआई कंपनी ने अलग-अलग क्षमता वाले तीन फाउंडेशनल मॉडल पेश किए हैं, जिनमें अरबों पैरामीटर शामिल हैं। पैरामीटर को एआई का “दिमाग” माना जाता है — जितनी अधिक संख्या, उतनी बेहतर समझ और परिणाम।

सरकार भी देश का अपना “सॉवरेन एआई” तैयार करने की योजना पर काम कर रही है। अक्टूबर 2024 में शुरू परियोजना का लक्ष्य भारत को एआई के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। अधिकारियों के अनुसार इसके लिए डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी निवेश बढ़ाया गया है।

 

एजीआई अभी दूर

वैश्विक विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानी बुद्धि जैसी क्षमता वाला आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) अभी तुरंत संभव नहीं है। अनुमान है कि इस स्तर की तकनीक विकसित होने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं और मौजूदा एआई सिस्टम अभी सीमित कार्यों तक ही प्रभावी हैं।

 

अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की दिलचस्पी

प्रमुख टेक कंपनियों ने भी भारत की एआई पहल में सहयोग की पेशकश की है। उन्नत एआई मॉडल को सरकारी परियोजनाओं में लागू करने और सार्वजनिक सेवाओं में ऑन-डिवाइस एआई के उपयोग पर जोर दिया गया है। इसके लिए बड़े निवेश की भी घोषणा की गई है।

 

एआई मिशन 2.0 की तैयारी

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय “एआई मिशन 2.0” लाने की तैयारी कर रहा है। इसके तहत एक डिजिटल मार्केटप्लेस बनाया जाएगा, जहां विकसित एआई मॉडल और उनसे जुड़े एप्लिकेशन उपलब्ध होंगे और बाद में इन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा।

 

विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल न केवल तकनीकी विकास को गति देगी बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक बदलाव ला सकती है।

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