
नई दिल्ली: भारत के व्यापार क्षेत्र से जुड़ी ताज़ा रिपोर्ट में सामने आया है कि फरवरी महीने में देश के माल (मर्चेंडाइज) निर्यात में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई, जबकि आयात में तेज़ उछाल दर्ज किया गया। इस असंतुलन के चलते व्यापार घाटा बढ़कर करीब 4 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में हुए 2.7 अरब डॉलर के अधिशेष से बिल्कुल उलट स्थिति दर्शाता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में निर्यात लगभग स्थिर रहा और यह करीब 36.6 अरब डॉलर के आसपास रहा, जबकि आयात में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली और यह 63 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया। इसका सीधा असर देश के व्यापार संतुलन पर पड़ा और घाटा चौड़ा हो गया।
मार्च में और बढ़ सकती हैं चुनौतियां
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने संकेत दिए हैं कि आने वाला मार्च महीना निर्यात के लिहाज से और भी कठिन हो सकता है। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण सप्लाई चेन पर असर पड़ रहा है। ऐसे में निर्यात गतिविधियों में गिरावट आना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी बताया कि जब किसी क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो परिवहन और आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सीधा असर पड़ता है।
कुल व्यापार में दिखी बढ़त, लेकिन संतुलन बिगड़ा
हालांकि कुल निर्यात (जिसमें सेवाएं भी शामिल हैं) में लगभग 11% की वृद्धि दर्ज की गई और यह 76 अरब डॉलर से अधिक रहा। वहीं, कुल आयात 21% से ज्यादा बढ़कर 80 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। इससे स्पष्ट है कि मांग तो बढ़ रही है, लेकिन निर्यात उस गति से नहीं बढ़ पा रहा।
सेवा क्षेत्र ने जरूर राहत दी है। फरवरी में सेवा निर्यात करीब 39.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो लगभग 25% की वृद्धि दर्शाता है। वहीं, सेवा आयात भी बढ़कर करीब 16.4 अरब डॉलर हो गया।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर पश्चिम एशिया की स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में भारत के निर्यात पर और दबाव बढ़ सकता है। लॉजिस्टिक लागत में वृद्धि और सप्लाई में देरी व्यापारियों के लिए चुनौती बन सकती है।
फरवरी के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत के व्यापार क्षेत्र में असंतुलन बढ़ रहा है। जहां आयात तेजी से बढ़ रहा है, वहीं निर्यात की रफ्तार धीमी पड़ गई है। मार्च में हालात और मुश्किल हो सकते हैं, खासकर वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए। अब निगाहें सरकार की रणनीतियों और वैश्विक हालात पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में व्यापार की दिशा तय करेंगे।






