
आज के समय में बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं के कई कारण सामने आ रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन का असली कारण कुछ और ही होता है। हाल ही में सामने आई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में बताया गया है कि कम सुनाई देना या सुनने की क्षमता में कमी भी बच्चों के पढ़ाई में पीछे रह जाने की एक बड़ी वजह बन रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अगर किसी बच्चे को ठीक से सुनाई नहीं देता, तो वह कक्षा में शिक्षक की बात पूरी तरह समझ नहीं पाता। इसका असर धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई, समझने की क्षमता और आत्मविश्वास पर पड़ने लगता है।
विश्व श्रवण दिवस पर सामने आई चिंता
विशेषज्ञों ने बताया कि 5 से 19 वर्ष तक के बच्चों में सुनने की क्षमता को लेकर खास ध्यान देने की जरूरत है। इस आयु में अगर सुनने से जुड़ी समस्या का समय पर पता नहीं चलता, तो बच्चे पढ़ाई में पिछड़ सकते हैं।
कई बार माता-पिता और शिक्षक भी इस समस्या को तुरंत पहचान नहीं पाते। उन्हें लगता है कि बच्चा पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहा या पढ़ाई में कमजोर है, जबकि असल कारण सुनने की परेशानी हो सकती है।
बच्चों के विकास पर पड़ता है सीधा असर
डॉक्टरों के अनुसार सुनने की क्षमता का सीधा संबंध बच्चों के सीखने, बोलने और समझने की प्रक्रिया से होता है।
अगर बच्चा शिक्षक की बात साफ नहीं सुन पाएगा तो वह:
. पढ़ाई में पीछे रह सकता है
. कक्षा में आत्मविश्वास खो सकता है
. अन्य बच्चों से बातचीत में झिझक महसूस कर सकता है
. धीरे-धीरे पढ़ाई में रुचि भी कम हो सकती है
इस कारण बच्चों का मानसिक और सामाजिक विकास भी प्रभावित हो सकता है।
तेज आवाज भी बन रही खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल तेज आवाज, हेडफोन का अधिक इस्तेमाल और शोर वाले वातावरण में रहने से भी सुनने की क्षमता पर असर पड़ रहा है।
ध्वनि की तीव्रता के अनुसार सुरक्षित समय अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए:
10 से 60 डेसिबल – सुरक्षित स्तर
80 डेसिबल – लगभग 40 घंटे तक सुरक्षित
85 डेसिबल – लगभग 12 घंटे 30 मिनट
90 डेसिबल – करीब 4 घंटे
95 डेसिबल – लगभग 1 घंटा 15 मिनट
100 डेसिबल – लगभग 20 मिनट
105 डेसिबल – लगभग 8 मिनट
110 डेसिबल – केवल 2.5 मिनट
इससे ज्यादा समय तक तेज आवाज के संपर्क में रहने से कानों को नुकसान हो सकता है।
समस्या की पहचान क्यों जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बच्चों में सुनने की समस्या का समय रहते पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।
कई मामलों में 60 प्रतिशत से अधिक समस्याओं को रोका भी जा सकता है।
कान में संक्रमण, ज्यादा मैल जमा होना, या अन्य छोटी-मोटी समस्याएं भी सुनने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। शुरुआत में ये समस्याएं मामूली लगती हैं, लेकिन समय के साथ गंभीर रूप ले सकती हैं।
माता-पिता और शिक्षकों की जिम्मेदारी
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों के व्यवहार में कुछ संकेत दिखाई दें तो तुरंत जांच करवानी चाहिए। जैसे:
. बार-बार बात दोहराने को कहना
. टीवी या मोबाइल की आवाज ज्यादा रखना
. पढ़ाई में अचानक गिरावट आना
. कक्षा में ध्यान न लगना
ऐसे संकेत मिलने पर बच्चे की श्रवण जांच (Hearing Test) कराना जरूरी है।
जागरूकता ही सबसे बड़ा समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए सुनने की क्षमता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। समय पर जांच, तेज आवाज से बचाव और सही इलाज से बच्चों की इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
अगर समाज, स्कूल और परिवार मिलकर इस दिशा में जागरूकता बढ़ाएं, तो कई बच्चों को पढ़ाई में पीछे रह जाने से बचाया जा सकता है।







