भारत के कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) आयात में अप्रैल 2026 के दौरान कमी दर्ज की गई है। हालांकि आयात की मात्रा कम होने के बावजूद देश का कुल आयात बिल तेजी से बढ़ गया। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल महीने में भारत का क्रूड ऑयल आयात लगभग 4.3 प्रतिशत घटा, लेकिन इसकी कुल लागत पिछले वर्ष की तुलना में करीब 50 प्रतिशत अधिक रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव इसका मुख्य कारण है। वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता का असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर साफ दिखाई दे रहा है।
आयात कम, लेकिन खर्च ज्यादा
आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 में भारत ने लगभग 21 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया था, जबकि अप्रैल 2026 में यह घटकर करीब 20.1 मिलियन टन रह गया। दूसरी ओर, तेल आयात पर होने वाला खर्च 10.7 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग 16.3 अरब डॉलर पहुंच गया।
यह स्थिति बताती है कि भले ही भारत ने कम मात्रा में तेल खरीदा, लेकिन बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण देश को ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक बाजार में यही स्थिति बनी रही तो आने वाले महीनों में भी भारत के लिए ऊर्जा आयात महंगा बना रह सकता है।
पश्चिम एशिया संकट का असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को प्रभावित किया है। कई देशों में सप्लाई बाधित होने की आशंका के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती गतिविधियों ने भी तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। यहां किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर वैश्विक बाजार और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है।
प्राकृतिक गैस आयात में भी कमी
पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में भारत के तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) आयात में भी लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका एक बड़ा कारण घरेलू मांग में कमी बताया जा रहा है।
हालांकि, देश के अंदर प्राकृतिक गैस उत्पादन में भी थोड़ी गिरावट देखी गई। अप्रैल महीने में घरेलू गैस उत्पादन करीब 4.2 प्रतिशत कम रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि उद्योगों और बिजली क्षेत्र में गैस की मांग कम होने के चलते आयात घटा है।
परिवहन क्षेत्र पर बढ़ता दबाव
डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अब परिवहन उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। ट्रांसपोर्ट कंपनियों ने माल भाड़े की दरों में लगभग 4 प्रतिशत तक वृद्धि करने का फैसला लिया है।
ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस और अन्य संगठनों का कहना है कि ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अतिरिक्त बोझ ग्राहकों तक पहुंचाना मजबूरी बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन की कीमतों में जल्द राहत नहीं मिली, तो इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। क्योंकि परिवहन लागत बढ़ने से बाजार में सामान महंगा होने की संभावना रहती है।
सरकार की रणनीति पर नजर
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार लगातार वैकल्पिक उपायों पर काम कर रही है। घरेलू उत्पादन बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने और रणनीतिक तेल भंडार मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को लंबे समय तक आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रीन एनर्जी और घरेलू ऊर्जा संसाधनों पर तेजी से निवेश बढ़ाना होगा।
फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अस्थिरता भारत के ऊर्जा क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। आने वाले महीनों में तेल की कीमतों और वैश्विक हालात पर सरकार और उद्योग दोनों की नजर बनी रहेगी।
Reference The Hindu