नई दिल्ली:
देशभर के लाखों छात्रों और अभिभावकों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। बोर्ड ने कक्षा 9वीं और 10वीं में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। यह नई व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से लागू की जाएगी। शिक्षा क्षेत्र में इस फैसले को नई शिक्षा नीति (NEP) की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
CBSE द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, छात्रों को अब अपनी नियमित पढ़ाई के साथ तीसरी भाषा का भी अध्ययन करना होगा। हालांकि बोर्ड ने यह स्पष्ट किया है कि तीसरी भाषा यानी R3 के लिए कक्षा 10 में अलग से कोई बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। इसका मूल्यांकन पूरी तरह स्कूल स्तर पर किया जाएगा।
स्कूल स्तर पर होगा मूल्यांकन
बोर्ड के अनुसार, तीसरी भाषा विषय का आकलन आंतरिक परीक्षा, प्रोजेक्ट, मौखिक परीक्षण और नियमित प्रदर्शन के आधार पर किया जाएगा। यानी छात्रों को बोर्ड परीक्षा के अतिरिक्त किसी अलग परीक्षा के दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।
CBSE अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य छात्रों की भाषाई समझ को मजबूत बनाना और भारत की बहुभाषी संस्कृति को बढ़ावा देना है। नई व्यवस्था के तहत स्कूलों को भी भाषा शिक्षण के लिए आवश्यक तैयारी करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रमाण पत्र में दर्ज होगा प्रदर्शन
CBSE ने यह भी बताया कि छात्रों के तीसरी भाषा विषय में प्रदर्शन को उनके आधिकारिक प्रमाण पत्र में शामिल किया जाएगा। यानी यह विषय केवल औपचारिकता नहीं रहेगा, बल्कि छात्र की शैक्षणिक प्रोफाइल का हिस्सा बनेगा।
हालांकि बोर्ड ने छात्रों और अभिभावकों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए यह साफ किया है कि यदि किसी छात्र का प्रदर्शन तीसरी भाषा में कमजोर रहता है, तब भी उसे कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा। इससे छात्रों पर अतिरिक्त मानसिक दबाव कम होने की उम्मीद है।
नई शिक्षा नीति से जुड़ा कदम
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में उठाया गया कदम है। सरकार लंबे समय से मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के अध्ययन पर जोर देती रही है। इसी उद्देश्य के तहत CBSE ने अब माध्यमिक स्तर पर तीन-भाषा प्रणाली को अधिक प्रभावी तरीके से लागू करने की तैयारी शुरू की है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई भाषाओं का ज्ञान छात्रों की संचार क्षमता, सोचने की शक्ति और सांस्कृतिक समझ को बेहतर बनाता है। इससे भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर के अवसरों में भी फायदा मिल सकता है।
छात्रों और अभिभावकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे छात्रों के समग्र विकास के लिए अच्छा कदम बता रहे हैं, वहीं कुछ अभिभावकों का मानना है कि पहले से मौजूद शैक्षणिक दबाव के बीच अतिरिक्त भाषा पढ़ना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कई शिक्षकों का कहना है कि यदि स्कूल सही तरीके से योजना बनाकर पढ़ाई कराएं, तो यह व्यवस्था छात्रों के लिए लाभदायक साबित हो सकती है। खासकर ऐसे छात्र जो भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं, उनके लिए बहुभाषी ज्ञान फायदेमंद रहेगा।
स्कूलों को करनी होगी तैयारी
नई व्यवस्था लागू होने से पहले स्कूलों को भाषा शिक्षकों की उपलब्धता, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली को लेकर विशेष तैयारी करनी होगी। ग्रामीण और छोटे शहरों के स्कूलों में भाषा शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
CBSE ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं ताकि सभी स्कूल एक समान तरीके से नियमों का पालन कर सकें।
शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव
शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि यह फैसला आने वाले वर्षों में स्कूल शिक्षा के स्वरूप को बदल सकता है। बहुभाषी शिक्षा न केवल छात्रों के ज्ञान को बढ़ाएगी, बल्कि उन्हें भारत की विविध संस्कृति और भाषाई विरासत से भी जोड़ने में मदद करेगी।
1 जुलाई से लागू होने वाला यह नया नियम अब देशभर के स्कूलों, छात्रों और अभिभावकों के लिए चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। आने वाले समय में इसका वास्तविक प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर किस तरह पड़ता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
Reference Akashvani