गलवान के बाद ‘खामोश धमाका’? चीन पर गुप्त परमाणु परीक्षण के आरोपों से हिली दुनिया

Newsic Explainer: साल 2020… जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही थी। शहर बंद थे, सीमाएं सील थीं और हर देश अपनी जनता को बचाने में लगा हुआ था। लेकिन इसी वैश्विक संकट के बीच, हिमालय की बर्फीली घाटियों में कुछ ऐसा घटा, जिसकी गूंज आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सुनाई दे रही है। गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हिंसक झड़प ने न केवल सीमा विवाद को उजागर किया, बल्कि अब इससे जुड़े ऐसे आरोप सामने आए हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।

15 जून 2020 की वह रात भारत के लिए बेहद दर्दनाक रही। गलवान घाटी में हुई झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए। उस समय इसे सीमा पर हुआ एक सैन्य टकराव माना गया, लेकिन अब अमेरिका के आरोप इस घटना को एक बड़े रणनीतिक परिदृश्य से जोड़ते नजर आ रहे हैं। अमेरिका का दावा है कि इसी तनाव की आड़ में चीन ने गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किए।

अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट थॉमस जी डिनैनो ने हाल ही में यह गंभीर आरोप लगाए। उनके मुताबिक, चीन ने ऐसे परमाणु विस्फोट किए जिन्हें जानबूझकर इस तरह अंजाम दिया गया कि दुनिया को इसकी भनक तक न लगे। अमेरिका का कहना है कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय भूकंप मापन प्रणालियों यानी सीस्मिक मॉनिटरिंग सिस्टम को चकमा देने की कोशिश की।

डिनैनो के अनुसार, 22 जून 2020 को चीन ने एक ऐसा ही गुप्त परमाणु परीक्षण किया। यह तारीख इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि यह गलवान घाटी की हिंसक झड़प के ठीक एक सप्ताह बाद की है। सवाल उठता है कि क्या चीन ने भारत-चीन तनाव और वैश्विक महामारी के बीच मिले अवसर का फायदा उठाकर अपनी परमाणु क्षमता को चुपचाप परखा?

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अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन ने जिस तकनीक का इस्तेमाल किया, उसे ‘डिकपलिंग’ कहा जाता है। इस तकनीक में विस्फोट को इस तरह अंजाम दिया जाता है कि उसके झटके बहुत कम महसूस हों। नतीजा यह होता है कि अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियां विस्फोट को सामान्य भूकंपीय गतिविधि समझ सकती हैं। अमेरिका का दावा है कि चीन न केवल छोटे, बल्कि सैकड़ों टन क्षमता वाले परमाणु परीक्षणों की तैयारी और क्रियान्वयन कर चुका है।

डिनैनो ने इस मुद्दे को केवल एक देश तक सीमित न बताते हुए इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा करार दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा परमाणु समझौते आज की चुनौतियों से निपटने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने न्यू स्टार्ट संधि का जिक्र किया, जो 2010 में अमेरिका और रूस के बीच हुई थी। इस संधि का उद्देश्य परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करना था, लेकिन चीन इस समझौते का हिस्सा नहीं है।

अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, जहां अमेरिका के अधिकांश परमाणु हथियार न्यू स्टार्ट संधि के तहत सीमित हैं, वहीं रूस के कई हथियार इसके दायरे से बाहर हैं और चीन पर तो इस संधि का कोई असर ही नहीं है। उनका कहना है कि 2026 तक यह समझौता अप्रासंगिक हो सकता है, क्योंकि चीन तेजी से अपने परमाणु जखीरे को बढ़ा रहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी संकेत दे चुके थे कि अगर रूस या चीन परमाणु परीक्षण करते हैं, तो अमेरिका भी जवाबी कदम उठा सकता है। डिनैनो का बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका, न्यू स्टार्ट संधि के भविष्य को लेकर नई रणनीति पर विचार कर रहा है और रूस व चीन के साथ नई बातचीत की संभावनाएं तलाश रहा है, हालांकि चीन फिलहाल ऐसी किसी भी वार्ता से दूरी बनाए हुए है।

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आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या गलवान घाटी की घटना सिर्फ एक सीमा संघर्ष थी, या इसके पीछे एक कहीं गहरी और खामोश रणनीति छिपी हुई थी?
इन आरोपों ने न केवल चीन की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि दुनिया को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम एक नए और ज्यादा खतरनाक परमाणु दौर की ओर बढ़ रहे हैं।

Ayush Mishra

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