जब थाली बदली, तो सेहत भी बदल गई
भारत में भोजन कभी केवल भूख मिटाने का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि यह हमारी संस्कृति, जीवनशैली और शारीरिक क्षमता का आधार रहा है। कुछ दशक पहले तक भारतीय घरों में रागी, ज्वार, बाजरा, कोदो और सांवा जैसे मोटे अनाज आम तौर पर इस्तेमाल किए जाते थे। किसान से लेकर मज़दूर तक इन्हीं अनाजों से बनी रोटियाँ खाकर दिनभर मेहनत करते थे और शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस नहीं होती थी।
लेकिन समय के साथ हमारी थाली बदली और उसी के साथ हमारी सेहत भी। आज थकान, डायबिटीज़, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याएँ आम हो गई हैं। सवाल उठता है—क्या इसका संबंध हमारे भोजन से है?
अकाल और हरित क्रांति: गेहूं का उदय कैसे हुआ
भारत को आज़ादी के बाद भयानक अकाल (Famine) का सामना करना पड़ा। देश में अनाज की भारी कमी थी और करोड़ों लोगों के सामने भूख का संकट खड़ा था। इसी समस्या से निपटने के लिए 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) की शुरुआत की गई।
हरित क्रांति के तहत हाईब्रिड बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल कर गेहूं और चावल का उत्पादन तेज़ी से बढ़ाया गया। इससे देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर तो बना, लेकिन इसके साथ ही गेहूं हमारी थाली का सबसे प्रमुख हिस्सा बन गया और पारंपरिक अनाज धीरे-धीरे पीछे छूटते चले गए।
आज का गेहूं: पहले जैसा नहीं रहा
आज जो गेहूं हम खाते हैं, वह पहले के प्राकृतिक गेहूं से काफ़ी अलग है।
- ज़्यादातर गेहूं हाईब्रिड किस्म का है
- रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ चुकी है
- इसमें ग्लूटेन की मात्रा भी पहले से अधिक मानी जाती है
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक अत्यधिक गेहूं का सेवन करने से शरीर में इंसुलिन असंतुलन, डायबिटीज़, मोटापा, पेट की समस्याएँ और लगातार बनी रहने वाली सुस्ती देखी जा रही है। कई लोगों को तो गेहूं खाने के बाद भारीपन और थकान महसूस होती है, जिससे शरीर स्वाभाविक रूप से Active Mode में नहीं जा पाता।
Millets: भारत का भूला-बिसरा पोषण खज़ानाJanarahi
जिसे हम आज “मिलेट्स” कहते हैं, वही अनाज कभी भारत की ताक़त हुआ करता था। अब पूरी दुनिया इन्हें Superfoods के रूप में अपना रही है।
रागी (Finger Millet)

रागी कैल्शियम और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। यह हड्डियों को मज़बूत बनाता है और शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद करता है।
ज्वार (Sorghum)

ज्वार ग्लूटेन-फ्री होता है, जिससे यह पाचन के लिए हल्का और दिल के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।
बाजरा

शरीर को गर्मी और ताक़त देता है। यह पाचन तंत्र को मज़बूत करता है और लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करता है।
इन अनाजों की खासियत यह है कि इन्हें खाने के बाद शरीर सुस्त नहीं होता, बल्कि काम करने की इच्छा और ऊर्जा बढ़ती है।
आज कई न्यूट्रिशन एक्सपर्ट भी मल्टीग्रेन आटे को रोज़मर्रा के भोजन में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं।
पुरानी भोजन शैली और सक्रिय जीवन
पहले के समय में भोजन स्थानीय, मौसमी और सादा होता था। उसी भोजन के अनुसार शरीर ढला हुआ था। लोग ज़्यादा चलते थे, ज़्यादा काम करते थे और बीमारियाँ कम होती थीं। आज फिर से यदि हम उसी भोजन पद्धति की ओर लौटें, तो हमारा शरीर स्वाभाविक रूप से अधिक सक्रिय और स्वस्थ रह सकता है।
आगे बढ़ने के लिए पीछे लौटना ज़रूरी
समस्या गेहूं नहीं है, समस्या है उस पर हमारी पूरी निर्भरता। यदि हम अपनी थाली में रागी, ज्वार, बाजरा और अन्य मिलेट्स को दोबारा जगह दें, तो यह सेहत के लिए एक बड़ा सकारात्मक बदलाव हो सकता है।
शायद बेहतर स्वास्थ्य का रास्ता आधुनिक विकल्पों में नहीं, बल्कि हमारी पारंपरिक भोजन परंपरा में ही छुपा है।




















