एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन सिर्फ दावा? WhatsApp पर गंभीर आरोप

अमेरिका में लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp और उसकी पैरेंट कंपनी Meta की गोपनीयता नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कंपनी के खिलाफ एक क्लास-एक्शन मुकदमा दायर किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि WhatsApp अपने एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के दावों के बावजूद यूज़र्स के निजी मैसेज तक पहुंच बना सकता है।

क्या है पूरा मामला?

मुकदमे में कहा गया है कि WhatsApp यह दावा करता है कि वह यूज़र्स के संदेश नहीं पढ़ सकता, लेकिन हकीकत में Meta के पास ऐसे तकनीकी रास्ते मौजूद हैं जिनसे वह निजी बातचीत तक पहुंच बना सकता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कंपनी ने एक “गुप्त तकनीक” का इस्तेमाल किया, जिससे एन्क्रिप्शन को बायपास किया जा सकता है।

एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन क्यों अहम?

एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का मतलब होता है कि संदेश केवल भेजने वाले और पाने वाले के डिवाइस पर ही पढ़े जा सकते हैं। बीच में कोई तीसरा पक्ष—यहां तक कि कंपनी खुद—उन्हें नहीं देख सकती। लेकिन इस मुकदमे में दावा किया गया है कि यह सुरक्षा पूरी तरह “अभेद्य” नहीं है।

Meta पर पहले भी लगे हैं आरोप

याचिका में Meta के पुराने रिकॉर्ड का भी हवाला दिया गया है। इसमें कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे विवादों का जिक्र है, जहां यूज़र्स के डेटा के गलत इस्तेमाल के आरोप लगे थे। इन्हीं मामलों के चलते कंपनी पर पहले भी भारी जुर्माना लगाया जा चुका है।

भारत के लिए क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण?

यह विवाद भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां WhatsApp सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले मैसेजिंग ऐप्स में से एक है। भारत में WhatsApp पहले से ही सरकार की नई आईटी गाइडलाइंस को लेकर Delhi High Court में कानूनी चुनौती दे चुका है। कंपनी का कहना है कि मैसेज के “पहले स्रोत” की पहचान करने की मांग से यूज़र्स की प्राइवेसी प्रभावित होगी।

आगे क्या हो सकता है असर?

अगर अमेरिका में यह आरोप सही साबित होते हैं, तो इससे WhatsApp की भारत में चल रही कानूनी लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। साथ ही, कंपनी को भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत भी कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

यह मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में यूज़र्स की निजता और टेक कंपनियों की जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा करता है। आने वाले समय में इस मुकदमे का फैसला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की कार्यप्रणाली पर दूरगामी असर डाल सकता है।

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