संगम स्नान को लेकर प्रशासन से टकराव, पांच दिनों से धरने पर बैठे ज्योतिष पीठाधीश्वर
प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 के बीच ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत अचानक बिगड़ गई। तेज बुखार और बदन दर्द के चलते उन्हें पालकी से उतरकर अपनी वैन में आराम करना पड़ा। वसंत पंचमी जैसे पावन अवसर पर भी वह संगम स्नान के लिए नहीं जा सके और पूरा दिन शिविर में ही रहे।
उनकी तबीयत बिगड़ने के पीछे केवल स्वास्थ्य कारण नहीं, बल्कि पिछले कई दिनों से चल रहा प्रशासन के साथ तनाव भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर मेला प्रशासन और शंकराचार्य के शिष्यों के बीच टकराव हुआ था। इसी घटना के बाद से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पिछले पांच दिनों से शिविर के बाहर पालकी पर धरने पर बैठे हैं।
क्या है पूरा मामला?
शंकराचार्य का आरोप है कि मौनी अमावस्या के दिन पुलिस ने उनके शिष्यों के साथ अभद्र व्यवहार किया और उन्हें संगम स्नान से रोका गया। उनका कहना है कि यह न केवल धार्मिक भावनाओं का अपमान है, बल्कि सनातन परंपराओं पर भी आघात है।
वहीं मेला प्रशासन का कहना है कि उस दिन संगम क्षेत्र में भारी भीड़ थी और किसी भी तरह की अनहोनी से बचने के लिए भीड़ नियंत्रण बेहद जरूरी था। प्रशासन के अनुसार, सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ सख्त कदम उठाने पड़े।
राजनीति और संत समाज भी आमने-सामने
यह मामला अब केवल धार्मिक या प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसमें राजनीति भी शामिल हो चुकी है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, योग गुरु बाबा रामदेव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान सामने आ चुके हैं। हर किसी ने अपने-अपने नजरिए से इस घटना पर प्रतिक्रिया दी है, जिससे मामला और गरमा गया है।
डिप्टी मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य से संगम स्नान कर विवाद को समाप्त करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह माघ मेला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है और ऐसे में सौहार्द बनाए रखना जरूरी है।
शंकराचार्य का साफ संदेश
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक मेला प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, वह संगम स्नान नहीं करेंगे। उनका कहना है कि यह केवल उनका व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि संत समाज के सम्मान से जुड़ा विषय है।
अब आगे क्या?
फिलहाल माघ मेला प्रशासन और शंकराचार्य के बीच टकराव एक बड़े धार्मिक, प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दे में बदल चुका है। संत समाज, श्रद्धालु और आम जनता इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। अब यह देखना अहम होगा कि दोनों पक्ष किसी समाधान पर पहुंचते हैं या यह विवाद और गहराता है।


















