
News Desk: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच हाल के हमलों ने दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को लेकर नई चिंताएँ खड़ी कर दी हैं। दोनों देशों के बीच सीमा पर झड़पें पहले भी होती रही हैं, लेकिन अगर यह तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है तो इसका असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र और वैश्विक राजनीति पर पड़ सकता है।
आइए समझते हैं कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो दुनिया को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
1. सीमा अस्थिरता और आतंकवादी संगठनों का खतरा
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लगभग 2600 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे डूरंड रेखा कहा जाता है। इस सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच दशकों पुराना विवाद है। अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो इतनी लंबी सीमा पर नियंत्रण बनाए रखना बेहद कठिन हो जाएगा।
ऐसे हालात में कट्टरपंथी और आतंकी संगठन सक्रिय होने की कोशिश कर सकते हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), इस्लामिक स्टेट-खोरासान (ISIS-K) और अल-कायदा जैसे संगठन इस अस्थिरता का फायदा उठाकर अपनी गतिविधियाँ बढ़ा सकते हैं। इससे न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है।
2. आर्थिक संकट और मानवीय त्रासदी
पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। विदेशी कर्ज, महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार ने उसकी स्थिति कमजोर कर रखी है। ऐसे समय में युद्ध का खर्च उसकी अर्थव्यवस्था को और गहरे संकट में डाल सकता है।

दूसरी ओर, अफगानिस्तान की स्थिति भी बेहतर नहीं है। तालिबान शासन को सीमित अंतरराष्ट्रीय सहायता मिल रही है। अगर युद्ध छिड़ता है तो यह मदद भी प्रभावित हो सकती है, जिससे देश में खाद्य संकट, विस्थापन और मानवीय त्रासदी बढ़ने का खतरा रहेगा।
3. गुरिल्ला युद्ध और पाकिस्तान की सैन्य चुनौती
पाकिस्तान की सेना आकार और संसाधनों में मजबूत मानी जाती है, लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान की ताकत उनकी पारंपरिक सेना नहीं बल्कि गुरिल्ला रणनीति है। पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में लड़ाई पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगी।
अगर संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह पाकिस्तान की सेना को थका सकता है और आंतरिक अस्थिरता भी बढ़ा सकता है। खासकर पश्तून बहुल इलाकों में तनाव बढ़ने से अलगाववादी भावनाएँ उभर सकती हैं, जिससे देश के भीतर नई राजनीतिक चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।
4. चीन के निवेश पर खतरा
पाकिस्तान में चीन का भारी निवेश है, खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना के तहत। यह परियोजना चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का अहम हिस्सा है। अगर पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो इन परियोजनाओं की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
चीन नहीं चाहेगा कि उसका रणनीतिक सहयोगी पाकिस्तान लंबे युद्ध में उलझे। इसलिए संभावना है कि वह कूटनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप कर तनाव कम कराने की कोशिश करे।
5. भारत के लिए रणनीतिक संतुलन
यदि पाकिस्तान को अपनी सेना का बड़ा हिस्सा पश्चिमी सीमा पर तैनात करना पड़ता है, तो भारत के साथ लगी उसकी पूर्वी सीमा पर सैन्य दबाव कम हो सकता है। यह भारत के लिए सामरिक दृष्टि से राहत की स्थिति हो सकती है।
हालांकि, यह पूरी तरह सकारात्मक परिदृश्य नहीं होगा। युद्ध की स्थिति में सीमा पार घुसपैठ, आतंकवादी गतिविधियों और क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए भारत को सतर्क और संतुलित रणनीति अपनानी होगी।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ दो देशों का मामला नहीं है। यह दक्षिण एशिया की स्थिरता, वैश्विक सुरक्षा, चीन के निवेश और भारत की रणनीति से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
अगर हालात कूटनीतिक स्तर पर नहीं संभाले गए, तो यह संघर्ष एक ऐसे चक्र में फंस सकता है जिससे निकलना दोनों देशों के लिए मुश्किल होगा। फिलहाल, दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या बातचीत और मध्यस्थता के जरिए स्थिति को शांत किया जा सकता है या फिर क्षेत्र एक बड़े टकराव की ओर बढ़ेगा।








