
मुंबई |
मुंबई की व्यस्त सड़कों के बीच एक ऐसी सड़क भी है जहाँ वाहन चलते ही “संगीत” सुनाई देता है। शहर के उपनगर में बनी यह खास सड़क, जिसे आम बोलचाल में मेलोडी रोड कहा जा रहा है, लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है। यहां गाड़ी निर्धारित गति से गुजरती है तो टायरों की कंपन से एक मधुर धुन सुनाई पड़ती है। इस अनोखी पहल के पीछे सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रयोग दोनों जुड़े हैं।
कैसे काम करती है यह सड़क
विशेषज्ञ बताते हैं कि सड़क की सतह पर बहुत सोच-समझकर समान दूरी पर खांचे (grooves) बनाए गए हैं। जब कार या बाइक इन खांचों के ऊपर से गुजरती है, तो टायरों और सड़क के बीच घर्षण पैदा होता है।
यह कंपन वाहन के ढांचे तक पहुंचती है और फिर हवा में ध्वनि तरंगों के रूप में सुनाई देती है।
अगर वाहन सही गति (एक तय स्पीड) पर चलता है तो धुन साफ सुनाई देती है
बहुत तेज या बहुत धीमी रफ्तार होने पर संगीत बिगड़ जाता है
यानी यह सड़क ड्राइवर को बिना बोर्ड पढ़े ही संकेत देती है कि वह सही गति से चल रहा है या नहीं। इस तरह यह तकनीक अप्रत्यक्ष रूप से स्पीड कंट्रोल का काम करती है।
सुरक्षा से भी जुड़ा है प्रयोग
इंजीनियरों के अनुसार इस तरह की सड़कों का एक बड़ा उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं को कम करना है।
हाईवे पर कई बार ड्राइवर ऊब या नींद के कारण ध्यान खो देते हैं। जब अचानक टायरों से संगीत जैसी आवाज आती है तो चालक सतर्क हो जाता है।
स्थानीय लोगों ने भी माना कि लोग अब इस हिस्से से गुजरते समय गति कम रखते हैं और सड़क पर ध्यान देते हैं। हालांकि कुछ निवासियों ने शोर की शिकायत भी की है, खासकर रात में अधिक यातायात होने पर।
‘म्यूजिकल रोड’ का विज्ञान
संगीत सुनाई देने के पीछे पूरा गणित काम करता है:
खांचों के बीच की दूरी अलग-अलग सुर (नोट) तय करती है
दूरी ज्यादा होगी तो आवाज गहरी (लो पिच) बनेगी
दूरी कम होगी तो आवाज तीखी (हाई पिच) होगी
जब वाहन एक स्थिर रफ्तार से चलता है, तब ये कंपन क्रमबद्ध होकर धुन जैसा प्रभाव पैदा करते हैं। पर्यावरणीय कारक जैसे हवा, आसपास की इमारतें और पेड़ भी ध्वनि की स्पष्टता को प्रभावित करते हैं।
दुनिया में कहाँ-कहाँ हैं ऐसी सड़कें
म्यूजिकल रोड का विचार नया नहीं है।
1990 के दशक में यूरोप में पहली बार ऐसी तकनीक विकसित हुई थी, जब इंजीनियरों ने सड़क पर पैटर्न बनाकर वाहन चलने पर ध्वनि पैदा करने का प्रयोग किया। बाद में जापान में इसे बड़े स्तर पर अपनाया गया और वहाँ कई जगहों पर ड्राइवरों को सुरक्षित ड्राइविंग के लिए ऐसी सड़कें बनाई गईं।
इसके बाद दक्षिण कोरिया, अमेरिका, हंगरी, ताइवान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी यह प्रयोग किया गया। कई जगह इनका उद्देश्य पर्यटन बढ़ाना रहा, तो कहीं केवल सड़क सुरक्षा।
भारत में शुरुआत
भारत में यह प्रयोग तटीय मार्ग (कोस्टल रोड) के एक हिस्से पर किया गया। सड़क के लगभग आधा किलोमीटर लंबे हिस्से पर खास डिज़ाइन तैयार किया गया है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की तकनीकी मदद से इसे विकसित किया गया, ताकि भारतीय परिस्थितियों — भारी ट्रैफिक, मौसम और धूल — में भी यह काम कर सके।
लोगों की प्रतिक्रिया
यह सड़क सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। कई लोग केवल इस अनुभव को रिकॉर्ड करने के लिए अपनी गाड़ी लेकर वहां जा रहे हैं। बच्चों और युवाओं में खास उत्साह देखा जा रहा है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे प्रयोग आबादी वाले इलाकों से थोड़ी दूरी पर होने चाहिए, ताकि ध्वनि प्रदूषण की समस्या न बढ़े।
भविष्य की संभावना
ट्रैफिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भारत के एक्सप्रेसवे और हाईवे पर भी ऐसी तकनीक अपनाई जा सकती है। इससे ड्राइवरों को गति नियंत्रित करने का प्राकृतिक संकेत मिलेगा और दुर्घटनाओं में कमी आ सकती है।
मुंबई की यह मेलोडी रोड सिर्फ एक अनोखा अनुभव नहीं, बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और सड़क सुरक्षा का बेहतरीन मेल है। जहां आमतौर पर सड़कें केवल यात्रा का माध्यम होती हैं, वहीं यह सड़क सफर को यादगार भी बना रही है — यानी अब रास्ता भी गुनगुनाने लगा है।






