News Desk Patna: ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार कड़े बयान दे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने चेतावनी दी कि अगर विरोध प्रदर्शनों से जुड़े किसी व्यक्ति को ईरान में फांसी दी जाती है, तो अमेरिका इसके जवाब में सख्त कार्रवाई कर सकता है।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि अमेरिका के लिए ईरान पर सीधा सैन्य हमला करना उतना आसान नहीं है, जितना बयानों में दिखाई देता है। इसके पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं।
फिलहाल मध्य पूर्व क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी सीमित है। राष्ट्रपति की आक्रामक भाषा के बावजूद अमेरिका ने इस इलाके की ओर कोई एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात नहीं किया है। खाड़ी क्षेत्र के कई देश पिछले वर्षों में हुए संघर्षों के प्रभाव से अभी पूरी तरह बाहर नहीं आ पाए हैं और वे किसी नए युद्ध में खुलकर शामिल होने से बचना चाहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो इससे ईरान की सरकार को घरेलू समर्थन मिल सकता है और वह आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए बाहरी खतरे का हवाला दे सकती है।
अमेरिका की एक और बड़ी मजबूरी क्षेत्रीय सहयोगियों पर उसकी निर्भरता है। मौजूदा हालात में ईरान पर हवाई या मिसाइल हमला तभी संभव है, जब अमेरिका मध्य पूर्व में स्थित अपने सहयोगी देशों के एयरबेस का इस्तेमाल करे। इसके लिए कतर, बहरीन, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों की अनुमति जरूरी होगी। इसके साथ ही अमेरिका को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन देशों को ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई से बचाया जा सके, जो किसी भी सैन्य रणनीति को और जटिल बना देता है।
कुछ सैन्य विकल्प ऐसे भी हैं जिनमें अत्याधुनिक बी-2 स्टील्थ बॉम्बर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह रास्ता भी जोखिमों से भरा है। अगर हमला किसी शहरी या घनी आबादी वाले इलाके में हुआ, तो बड़ी संख्या में नागरिकों के हताहत होने की आशंका रहेगी। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की आलोचना हो सकती है और स्थिति और ज्यादा बिगड़ सकती है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि अगर उसके देश पर हमला हुआ, तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और जहाजों को निशाना बनाएगा।
ईरान की सैन्य क्षमता भी अमेरिका के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। हालिया संघर्षों में भले ही ईरान को नुकसान हुआ हो, लेकिन उसकी मिसाइल ताकत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ईरान के कई लॉन्च साइट पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं, जिन्हें फिर से सक्रिय किया जा रहा है। माना जाता है कि ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं, जो एक साथ दागी जाने पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की एयर डिफेंस प्रणाली के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
कुल मिलाकर, ईरान पर हमला सिर्फ सैन्य ताकत का सवाल नहीं है। इसमें क्षेत्रीय राजनीति, अंतरराष्ट्रीय दबाव, सहयोगी देशों की भूमिका और संभावित जवाबी कार्रवाई जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि कड़े बयानों के बावजूद अमेरिका फिलहाल सीधे सैन्य कदम उठाने से बचता हुआ नजर आ रहा है।
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