
नई दिल्ली
भारत में महिलाओं की सेहत से जुड़ी एक गंभीर चुनौती — सर्वाइकल कैंसर — को रोकने के लिए अब बड़े स्तर पर पहल शुरू होने जा रही है। केंद्र सरकार जल्द ही देश-व्यापी एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) टीकाकरण अभियान शुरू करने की तैयारी में है, जिसका मुख्य लक्ष्य 14 वर्ष की आयु की लड़कियों को सुरक्षा कवच देना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अभियान सफल रहा, तो आने वाले वर्षों में लाखों जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
आखिर क्यों जरूरी है यह वैक्सीन?
डॉक्टर बताते हैं कि एचपीवी एक बहुत आम वायरस है जो त्वचा-से-त्वचा संपर्क से फैलता है। अक्सर यह संक्रमण बिना लक्षण के होता है, लेकिन कुछ मामलों में यही वायरस आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर का कारण बन जाता है।
मेडिकल रिसर्च के अनुसार लगभग अधिकांश सर्वाइकल कैंसर मामलों के पीछे लगातार बना रहने वाला एचपीवी संक्रमण जिम्मेदार होता है। यही वायरस गले, गुदा, योनि और अन्य कैंसरों से भी जुड़ा पाया गया है।
भारत में यह बीमारी महिलाओं में सबसे आम कैंसरों में गिनी जाती है और हर साल बड़ी संख्या में मौतों का कारण बनती है। इसलिए डॉक्टरों की राय है कि इलाज से ज्यादा असरदार उपाय “रोकथाम” है — और रोकथाम का सबसे मजबूत तरीका यही टीका है।
कौन लगवा सकेगा टीका और कैसे चलेगा अभियान?
सरकार का प्रस्तावित अभियान लगभग 90 दिनों तक चल सकता है। इस दौरान 14 वर्ष की सभी किशोरियों को स्कूलों और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से टीका लगाया जाएगा।
. टीका स्कूलों में विशेष शिविर लगाकर दिया जाएगा
. जो छात्राएँ स्कूल में नहीं हैं, उन्हें स्वास्थ्य केंद्रों पर बुलाया जाएगा
. कोविड टीकाकरण की तरह स्थानीय स्तर पर अभियान चलाया जाएगा
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उम्र इसलिए चुनी गई है क्योंकि इस समय शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सबसे प्रभावी होती है और भविष्य में संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है।
कौन-सी वैक्सीन इस्तेमाल होगी?
शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से प्रमाणित टीके का उपयोग किया जाएगा। बाद में भारत में विकसित स्वदेशी टीका भी शामिल किया जा सकता है, जिसे सस्ता और व्यापक उपयोग के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।
वैश्विक वैक्सीन साझेदारी कार्यक्रम के तहत आने वाले दो वर्षों में करोड़ों खुराक उपलब्ध कराई जाएँगी ताकि अभियान निरंतर चलता रहे।
क्या एक ही डोज काफी है?
विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार 9 से 14 वर्ष की आयु की लड़कियों में एक खुराक भी मजबूत सुरक्षा दे सकती है।
हालांकि:
अधिक उम्र की महिलाओं को दो खुराक की सलाह दी जाती है
जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है, उन्हें अतिरिक्त डोज की जरूरत पड़ सकती है
भारत के लिए क्यों अहम है यह पहल?
आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। देश में हर साल करीब 1.25 लाख महिलाएँ इस कैंसर से प्रभावित होती हैं और लगभग 75 हजार मौतें दर्ज की जाती हैं। यानी विश्व के कुल मामलों का बड़ा हिस्सा भारत में पाया जाता है।
एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि जिन लड़कियों को 17 वर्ष से पहले टीका लगा था, उनमें आगे चलकर सर्वाइकल कैंसर का खतरा लगभग 88% तक कम हो गया।
डॉक्टरों का मानना है कि बड़े पैमाने पर टीकाकरण होने से संक्रमण का प्रसार भी घटेगा और अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों को भी सुरक्षा मिलेगी।
. समाज के लिए दूरगामी फायदे
. यह अभियान केवल बीमारी रोकने तक सीमित नहीं रहेगा। इसके अन्य प्रभाव भी होंगे:
. महिलाओं की समय से पहले होने वाली मौतों में कमी
. परिवारों पर आर्थिक बोझ कम
. अस्पतालों में कैंसर मरीजों की संख्या घटेगी
. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ेगी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के शब्दों में, “यह सिर्फ एक टीका नहीं, आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने की शुरुआत है।”
मानवीय पहलू: डर नहीं, जागरूकता जरूरी
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर टीकाकरण को लेकर संकोच रहता है। डॉक्टर और आशा कार्यकर्ता घर-घर जाकर अभिभावकों को समझा रहे हैं कि यह टीका प्रजनन क्षमता या विकास पर कोई बुरा असर नहीं डालता।
एक महिला स्वास्थ्यकर्मी ने कहा, “अगर माता-पिता समझ जाएँ कि यह टीका उनकी बेटी को जानलेवा बीमारी से बचा सकता है, तो वे खुद आगे आकर टीका लगवाएँगे।”
भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ सही समय पर उठाया गया कदम लाखों परिवारों को शोक से बचा सकता है। एचपीवी टीकाकरण अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य अधिकार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों की अपील साफ है — डर नहीं, जानकारी अपनाइए और बेटियों को टीका जरूर लगवाइए।






