Four Stars of Destiny के पन्नों से सामने आई 31 अगस्त 2020 की सबसे तनावपूर्ण कहानी
नई दिल्ली | The Newsic Special Report
लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तनाव कोई नई बात नहीं है।

लेकिन 31 अगस्त 2020 की रात ऐसी थी, जब एक गलत फैसला भारत और चीन को सीधे युद्ध की ओर धकेल सकता था।
यह कहानी है उस रात की —
जब चीनी टैंक आगे बढ़ रहे थे,
भारतीय तोपें तैयार थीं,
और देश का सैन्य नेतृत्व एक साफ आदेश का इंतज़ार कर रहा था।
इस पूरी घटना का ज़िक्र पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी किताब
“Four Stars of Destiny” में किया है।
इसी हिस्से को हाल में कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसके बाद Galwan की उस रात पर बहस फिर तेज हो गई।
रात 8:15 बजे: पहला अलार्म
31 अगस्त 2020 की रात ठीक 8:15 बजे,
भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के प्रमुख
लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को एक बेहद गंभीर सूचना मिली।
इंटेलिजेंस रिपोर्ट साफ थी—
चार चीनी टैंक
पूर्वी लद्दाख में रेज़ांग ला की ओर बढ़ रहे हैं।
यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद अहम था।
भारतीय सेना कुछ ही घंटे पहले इस ऊँचाई पर कब्ज़ा कर चुकी थी।
चीनी टैंक अब भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे।
जोशी ने तुरंत यह जानकारी
सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी।
पाकिस्तान नहीं, चीन था सामने

नरवणे अपनी किताब में लिखते हैं—
“पाकिस्तान के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर आर्टिलरी फायर सामान्य प्रक्रिया है।
लेकिन चीन के साथ एक भी गोली — राजनीतिक और रणनीतिक फैसला होती है।”
यही इस रात की सबसे बड़ी दुविधा थी।
भारतीय मीडियम आर्टिलरी पूरी तरह तैयार थी
फायरिंग से चीनी टैंकों को रोका जा सकता था
लेकिन ऊपर से स्पष्ट आदेश नहीं था

सेना का प्रोटोकॉल साफ कहता था—
राजनीतिक मंज़ूरी के बिना फायर नहीं
दिल्ली में बेचैनी, लद्दाख में सन्नाटा
सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में
लगातार विकल्पों पर चर्चा हो रही थी।
पूरे नॉर्दर्न फ्रंट को हाई अलर्ट पर रखा गया
संभावित टकराव बिंदुओं पर निगरानी बढ़ाई गई
लेकिन अंतिम निर्णय अब भी लंबित था
नरवणे ने एक के बाद एक फोन किए—
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल
CDS जनरल बिपिन रावत
विदेश मंत्री एस. जयशंकर
हर किसी के सामने वही सवाल था—
अगर गोली चली, तो क्या हम पूरी जंग के लिए तैयार हैं?

हर मिनट बढ़ता खतरा
रात आगे बढ़ती गई।
और खतरा और नज़दीक आता गया।
चीनी टैंक अब 1 किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे
फिर 500 मीटर
भारतीय तोपें सिर्फ आदेश का इंतज़ार कर रही थीं
लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने साफ कहा—
“चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका
हमारी मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग है।”
PLA का अप्रत्याशित संदेश
इसी बीच,
PLA कमांडर मेजर जनरल लियू लिन की ओर से एक संदेश आया—
दोनों पक्ष आगे बढ़ना रोकें
अगले दिन सुबह 9:30 बजे
स्थानीय कमांडरों की बैठक हो
यह प्रस्ताव तनाव कम करने की कोशिश जैसा लग रहा था।
एक पल के लिए ऐसा लगा
कि शायद कोई रास्ता निकल रहा है।
10:30 बजे: प्रधानमंत्री का संदेश
रात 10:30 बजे,
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का फोन आया।
वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर चुके थे।
प्रधानमंत्री का संदेश
सिर्फ एक लाइन में था—
“जो आपको उचित लगे, वही करो।”

नरवणे लिखते हैं—
“मुझे लगा जैसे मेरे हाथ में एक गरम आलू थमा दिया गया हो।
अब पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर थी।”
वो फैसला, जिसने गोली नहीं चलने दी
आख़िरकार,
सेना प्रमुख ने आर्टिलरी फायर का आदेश नहीं दिया।
चीनी टैंक आगे नहीं बढ़े
रात बेहद तनाव में कटी
अगली सुबह बातचीत हुई
हालात धीरे-धीरे स्थिर हुए
एक भी गोली चलती,
तो हालात पूरी तरह बदल सकते थे।
आज क्यों उठ रहा है सवाल?
कांग्रेस ने नरवणे की किताब के इसी हिस्से को शेयर करते हुए पूछा—
क्या सेना को स्पष्ट निर्देश देर से मिले?
क्या निर्णय लेने में राजनीतिक असमंजस था?
क्या फील्ड कमांडरों पर अत्यधिक दबाव छोड़ा गया?
वहीं सरकार समर्थकों का कहना है—
युद्ध टालना भी रणनीतिक जीत होती है
एक गोली से पूरा मोर्चा खुल सकता था
Galwan सिर्फ एक घाटी नहीं
Galwan की वो रात
सिर्फ़ टैंकों और तोपों की कहानी नहीं थी।
वो कहानी थी—
सैन्य संयम की
राजनीतिक जिम्मेदारी की
और उस फैसले की
जिसमें गोली न चलाना,
सबसे बड़ा फैसला था।


















