नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र से पहले सियासत तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जानकारी के अनुसार इस प्रस्ताव पर 118 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं और इसे लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया गया है। नियमों के तहत तय तारीख को इस पर चर्चा कराई जा सकती है।
क्यों लाया गया प्रस्ताव?
विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। उनका कहना है कि कुछ अहम मुद्दों पर चर्चा की मांग को अनदेखा किया गया और कई सांसदों को बोलने से रोका गया। इसी असंतोष के चलते यह कदम उठाया गया।
अध्यक्ष का पक्ष
लोकसभा अध्यक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वे सदन की कार्यवाही नियमों और संसदीय परंपराओं के अनुसार चला रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से संचालित होती है और किसी भी दल के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
सदन में क्या हुआ?
. विपक्ष के कई सांसदों ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान बोलने का मौका न मिलने की शिकायत की।
. कुछ सदस्यों को नारेबाजी और हंगामे के कारण निलंबित भी किया गया।
. प्रधानमंत्री पर की गई टिप्पणियों को लेकर भी विवाद बढ़ा और सदन का माहौल गरमा गया।
अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया
संसदीय नियमों के अनुसार:
. प्रस्ताव लाने के लिए न्यूनतम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।
. नोटिस स्वीकार होने के बाद तय समय पर सदन में चर्चा होती है।
. बहस के बाद मतदान कराया जाता है और परिणाम के आधार पर फैसला होता है।
राजनीतिक असर
यह घटनाक्रम आने वाले चुनावों से पहले सत्ता और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव को दिखाता है। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं, जिससे आने वाले दिनों में संसद का माहौल और गरम रहने की संभावना है।
कुल मिलाकर, यह अविश्वास प्रस्ताव सिर्फ संसदीय प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति भी माना जा रहा है, जिसका असर आगे की राजनीति पर देखने को मिल सकता है।

















