Border 2 Review : बड़ी उम्मीदें, कमजोर पटकथा और Sunny Deol का अकेला कंधा
1997 में रिलीज़ हुई Border भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली देशभक्ति फिल्मों में गिनी जाती है। उस फिल्म ने युद्ध, बलिदान और भावनाओं को जिस ईमानदारी से दिखाया था, उसने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। ऐसे में जब Border 2 को साल की सबसे बड़ी फिल्म के तौर पर प्रचारित किया गया, तो दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बहुत ऊंची थीं।
लेकिन रिलीज़ के बाद यह साफ हो जाता है कि Border 2 अपने नाम और विरासत का बोझ पूरी तरह संभाल नहीं पाती।
Border 2 Story Analysis: भावनात्मक शुरुआत, बिखरता हुआ दूसरा हाफ
फिल्म की कहानी 1969 से शुरू होती है, जहां नेशनल वॉर अकादमी में तीन युवा कैडेट—
निर्मलजीत सिंह सेखों (दिलजीत दोसांझ),
मेजर होशियार सिंह दहिया (वरुण धवन) और
लेफ्टिनेंट कमांडर जोसेफ नरोन्हा (अहान शेट्टी)
देश सेवा की कसम के साथ प्रशिक्षण लेते हैं।
इन तीनों के आदर्श और मेंटर हैं लेफ्टिनेंट फतेह सिंह केलर (Sunny Deol)। फिल्म का पहला हिस्सा दोस्ती, अनुशासन, परिवार और त्याग पर केंद्रित है। यहां कहानी यह दिखाने में सफल रहती है कि सैनिक के साथ-साथ उसके परिवार भी हर दिन देश के लिए बलिदान देते हैं।
मां का अपने बेटे को सीमा पर भेजना, पत्नी का पति की शहादत के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करना—ये दृश्य दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। यह हिस्सा कहीं-कहीं पहली Border की याद दिलाता है और फिल्म को मजबूती देता है।
Second Half Review: युद्ध दिखता है, गहराई महसूस नहीं होती
दूसरे हाफ में कहानी भारत-पाकिस्तान युद्ध की ओर मुड़ती है। पाकिस्तानी सेना को एक बार फिर साजिश रचते हुए दिखाया जाता है, लेकिन पूरी युद्ध रणनीति बेहद सतही लगती है।
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दिलजीत दोसांझ एयरफोर्स के मोर्चे पर दुश्मन को जवाब देते हैं
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वरुण धवन सीमा पर सैनिकों का नेतृत्व करते हैं
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अहान शेट्टी नेवी के ज़रिये जवाबी कार्रवाई करते हैं
युद्ध के दृश्य बड़े पैमाने पर फिल्माए गए हैं, लेकिन उनमें वो तनाव और सच्चाई नहीं है जो दर्शक को सीट से बांध कर रख सके। सबसे कमजोर कड़ी वह सीन है जहां दुश्मन कमांडर की धमकी और Sunny Deol के बेटे की शहादत को बेहद जल्दबाजी में दिखाया जाता है। यह भावनात्मक मोड़ और मजबूत हो सकता था, लेकिन कमजोर लेखन के कारण असर अधूरा रह जाता है।
Border 2 Cast Performance: Sunny Deol बनाम पूरी स्टारकास्ट
अगर अभिनय की बात करें तो Sunny Deol फिल्म की रीढ़ हैं। उनकी आवाज़, बॉडी लैंग्वेज और स्क्रीन प्रेज़ेंस आज भी उतनी ही प्रभावशाली है। हालांकि इस बार उनकी दहाड़ में वह जादू नहीं, जो पहली Border में देखने को मिला था।
Varun Dhawan इस फिल्म में सबसे कमजोर कड़ी साबित होते हैं। युद्ध के बीच उनके कई दृश्य गैर-जरूरी और अप्रभावी लगते हैं।
Diljit Dosanjh जैसे दमदार अभिनेता को स्क्रिप्ट ने सीमित कर दिया।
Ahan Shetty ठीक-ठाक हैं, लेकिन कोई खास छाप नहीं छोड़ते।
वहीं Paramvir Cheema और Mona Singh फिल्म में जान डालते हैं। मोना सिंह का बेटे की शहादत वाला सीन थिएटर में भावनात्मक सन्नाटा पैदा कर देता है और यही फिल्म का सबसे सशक्त पल बनता है।
Music & Direction Review: सबसे बड़ी कमजोरी
फिल्म का संगीत बेहद साधारण है।
सिर्फ एक गाना असर छोड़ पाता है, वह भी रिलीज़ से पहले ही हिट हो चुका था।
“घर कब आओगे” को Sandese Aate Hain की भावना दोहराने की कोशिश में जबरदस्ती जोड़ा गया लगता है।
निर्देशन फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। बड़े सेट, बड़ा बजट और बड़ा नाम होने के बावजूद निर्देशक कहानी को मजबूती से पकड़ नहीं पाते।
Border 2 Final Verdict: देखने लायक, याद रखने लायक नहीं
करीब 3 घंटे 17 मिनट की यह फिल्म दर्शक से बहुत धैर्य मांगती है।
पहला हाफ भावनात्मक रूप से मजबूत है और फिल्म को संभालता है।
दूसरा हाफ कुछ युद्ध दृश्यों के दम पर चलता है, लेकिन कमजोर कहानी और निर्देशन फिल्म को ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देते।
Border 2 एक ईमानदार कोशिश है, लेकिन एक यादगार फिल्म नहीं।
Sunny Deol की मौजूदगी इसे गिरने से बचा लेती है, मगर यह फिल्म उस विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाती जिसका नाम वह अपने साथ जोड़ती है।


















